राजस्व में सुस्ती और बढ़ते कर्ज के बोझ के चलते भारतीय राज्यों ने अपने कैपिटल स्पेंडिंग प्लान को घटाने का फैसला किया है। टारगेट **₹10 लाख करोड़** से घटकर **₹8.7 लाख करोड़** रह गया है, जिसका असर सीमेंट और कंस्ट्रक्शन कंपनियों पर पड़ सकता है।
भारतीय राज्यों की तिजोरियों पर इस समय भारी दबाव है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, टैक्स रेवेन्यू में उम्मीद से कम बढ़ोतरी ने राज्य सरकारों को अपने खर्चों को दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है। हालांकि राज्य जीएसटी (GST) कलेक्शन में 11-15% की बढ़त हुई है, लेकिन यह बजट में अनुमानित 24% की बढ़ोतरी से काफी कम है।
क्यों कम करना पड़ रहा है खर्च?
राजस्व और वास्तविक कमाई के बीच के इस अंतर को पाटने के लिए राज्यों ने बुनियादी ढांचे (Infrastructure) पर खर्च को ₹10 लाख करोड़ से घटाकर ₹8.7 लाख करोड़ करने का निर्णय लिया है। इसका सीधा मतलब है कि अब राज्यों की प्राथमिकता नए प्रोजेक्ट्स के बजाय सैलरी और पेंशन जैसे अनिवार्य खर्चों को पूरा करना है।
कर्ज हुआ महंगा
अक्टूबर 2026 के मध्य तक राज्यों के लिए कर्ज लेने की लागत 8.12% तक पहुंच गई है, जो 2019 के बाद से सबसे ऊंचे स्तर पर है। इसके अलावा, फ्री-बिजली स्कीम और सब्सिडी का बढ़ता बिल भी सरकारी खजाने पर भारी पड़ रहा है।
निवेशकों के लिए जोखिम
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि राज्यों का राजस्व घाटा (Fiscal Deficit) बढ़कर ₹2.8 लाख करोड़ हो गया है, जो शुरुआती अनुमान से दोगुना है। सीमेंट, कंस्ट्रक्शन और कैपिटल गुड्स जैसी सेक्टर की कंपनियों के लिए सरकारी ऑर्डर मिलने की रफ्तार धीमी हो सकती है। आने वाले समय में 16वें वित्त आयोग (16th Finance Commission) के नए नियमों का असर भी राज्यों की वित्तीय स्थिति पर पड़ेगा। बाजार की नजर अब इस बात पर है कि क्या राज्यों का राजकोषीय घाटा GSDP के 3.1% के दायरे में बना रहेगा या नहीं।
