स्टार्टअप्स में जवाबदेही को लेकर अब सख्ती बढ़ गई है। Byju’s और GoMechanic जैसी कंपनियों में हुई गड़बड़ियों के बाद निवेशकों का नजरिया बदल गया है और अब 'अंधाधुंध ग्रोथ' के बजाय ऑडिट और ट्रांसपेरेंसी पर जोर दिया जा रहा है।
स्टार्टअप्स के लिए बदलता दौर
फाउंडर की ईमानदारी और स्टार्टअप वैल्यूएशन का खेल अब एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। दुनिया भर में Theranos जैसे बड़े मामलों ने ध्यान खींचा है, लेकिन भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम ने भी हाल के सालों में बड़े गवर्नेंस संकट देखे हैं। Byju’s का विवाद और साल 2023 में GoMechanic की वित्तीय गड़बड़ियों ने इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स के सोचने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है।
क्यों फेल हुआ 'Growth at All Costs' मॉडल?
सालों तक स्टार्टअप्स में केवल 'ग्रोथ' को प्राथमिकता दी गई, जिसमें वैल्यूएशन और टॉप-लाइन बढ़ाने पर ध्यान था। लेकिन इन मामलों ने बाजार को जगाने का काम किया है। Byju’s के केस में ऑडिटर्स का इस्तीफा और वैल्यूएशन में बड़ी कटौती ने यह साफ कर दिया है कि फाइनेंशियल रिपोर्टिंग में देरी और बोर्ड की ढीली निगरानी कितनी खतरनाक हो सकती है। वहीं, GoMechanic के फाउंडर्स ने खुद माना कि उन्होंने अपने आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए थे, जो इंटरनल कंट्रोल के अभाव को दर्शाता है।
निवेशकों की बदली स्ट्रैटेजी
अब स्टार्टअप्स के लिए नियम बदल गए हैं। इन्वेस्टर्स अब पारदर्शिता, बोर्ड में इंडिपेंडेंट रिप्रेजेंटेशन और स्टैंडर्ड ऑडिटिंग पर जोर दे रहे हैं। अब फाउंडर्स के वादों पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय, डेटा-ड्रिवन अप्रोच अपनाई जा रही है। यह बदलाव तब और भी जरूरी हो जाता है जब कोई कंपनी पब्लिक मार्केट में लिस्टिंग की तैयारी कर रही हो।
आगे की राह: क्या देखें इन्वेस्टर्स?
जो कंपनियां ऑडिटेड फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स समय पर फाइल करती हैं और जिनके पास ऐसे इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स हैं जो मैनेजमेंट से सवाल पूछते हैं, उन्हीं पर अब बाजार का भरोसा बढ़ रहा है। गवर्नेंस में कमी होने पर कैपिटल की लागत बढ़ जाती है और फंड जुटाना मुश्किल हो जाता है। कुल मिलाकर, अब समय 'आक्रामक विस्तार' (Aggressive Expansion) के युग से आगे निकलकर 'टिकाऊ वैल्यू क्रिएशन' (Sustainable Value Creation) की ओर बढ़ने का है।
