भारत की ऑर्गेनाइज्ड स्टाफिंग इंडस्ट्री रोजगार सेवाओं पर GST को **18%** से घटाकर **5%** करने की मांग कर रही है। हालांकि, इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है और GST काउंसिल की बैठक अब **7 अक्टूबर, 2026** के लिए टाल दी गई है।
टैक्स कटौती क्यों जरूरी है?
इंडियन स्टाफिंग फेडरेशन की अगुवाई में यह मांग उठाई जा रही है कि रोजगार सेवाओं पर मौजूदा 18% GST दर को घटाकर 5% किया जाए। इंडस्ट्री का तर्क है कि मौजूदा टैक्स स्लैब फॉर्मल जॉब क्रिएशन में एक बड़ी रुकावट है, जिससे विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) पर लागत का बोझ बढ़ रहा है।
मार्जिन पर असर का गणित
स्टाफिंग फर्मों का बिजनेस मॉडल मुख्य रूप से कॉन्ट्रैक्ट स्टाफिंग पर आधारित होता है, जहां इनवॉइस का एक बड़ा हिस्सा कर्मचारियों के वेतन (wages) का होता है। चूंकि GST पूरे इनवॉइस वैल्यू पर लगता है, इसलिए वेतन वाले हिस्से पर भी 18% का टैक्स देना पड़ता है। स्टाफिंग कंपनियों का ऑपरेटिंग मार्जिन अमूमन 2% से 8% के बीच ही रहता है, इसलिए यह उच्च टैक्स दर ग्राहकों के लिए स्टाफिंग सेवाओं को महंगा बना देती है और फॉर्मल हायरिंग को हतोत्साहित करती है।
अब आगे क्या?
फिलहाल सरकार की तरफ से इस दर संशोधन पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। अब सबकी नजरें आगामी 7 अक्टूबर, 2026 को होने वाली GST काउंसिल की बैठक पर हैं, जिसे पहले 12 सितंबर को आयोजित किया जाना था।
निवेशकों के लिए, यह सेक्टर एक महत्वपूर्ण नजरिया रखता है क्योंकि फॉर्मल एंप्लॉयमेंट और सोशल बेनिफिट्स (जैसे प्रोविडेंट फंड) के मामले में स्टाफिंग कंपनियां एक अहम भूमिका निभाती हैं। यदि टैक्स दरों में कटौती होती है, तो यह सेक्टर के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है। हालांकि, किसी भी नीतिगत बदलाव की अनिश्चितता और लंबी प्रक्रिया को देखते हुए फिलहाल सावधानी बरतने की जरूरत है।
