श्रीनगर के अपटाउन इलाकों में पानी की भारी किल्लत हो गई है, जिससे करीब **2,00,000** निवासी प्रभावित हैं। दूधगंगा (Doodh Ganga) नदी के जलस्तर में बदलाव और ग्लेशियर्स के पिघलने से वॉटर ट्रीटमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी दबाव बढ़ गया है।
दूधगंगा नदी, जो झेलम की एक प्रमुख सहायक नदी है, में पानी की अनिश्चितता ने श्रीनगर के अपटाउन क्षेत्रों के लिए जल सुरक्षा की चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक, पीर पंजाल रेंज में ग्लेशियर्स के तेजी से पीछे हटने के कारण हाइड्रोलॉजिकल चक्र बदल गया है। शोध से पता चलता है कि इस क्षेत्र में ग्लेशियर का कुल क्षेत्रफल 1980 में 25.7 वर्ग किलोमीटर था, जो 2020 तक घटकर केवल 15.9 वर्ग किलोमीटर रह गया है। इस बदलाव के कारण बर्फ का प्राकृतिक भंडारण कम हो गया है, जिससे गर्मियों के दौरान पानी की उपलब्धता के दिन कम हो गए हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी दबाव
जल शक्ति विभाग, जो करीब 2,00,000 निवासियों को जलापूर्ति सुनिश्चित करता है, के सामने अब चुनौतियां बढ़ गई हैं। यह प्लांट 45.5 मिलियन लीटर प्रतिदिन की क्षमता के साथ काम करता है और क्रालपोरा (Kralpora) स्थित लिफ्ट स्टेशन का उपयोग करता है। हालांकि, मौसम की अनिश्चितता के कारण सिस्टम में बार-बार तकनीकी खामियां आ रही हैं। अचानक होने वाली भारी बारिश (Cloudbursts) के कारण पानी में गंदगी (Turbidity) बढ़ जाती है, जिसे साफ करना मौजूदा फिल्ट्रेशन सिस्टम के लिए मुश्किल हो जाता है। उपकरणों को नुकसान से बचाने के लिए अक्सर ऑपरेशंस को रोकना पड़ता है, जिससे स्थानीय आबादी को लंबी कटौती का सामना करना पड़ता है।
अनियोजित शहरी विकास
पर्यावरण के अलावा, अनियंत्रित शहरी निर्माण भी बड़ा संकट बना हुआ है। नदी के कैचमेंट एरिया में हो रहे निर्माणों ने प्राकृतिक जल धाराओं को खत्म कर दिया है। पहले ये धाराएं पानी के बहाव को नियंत्रित करने में मदद करती थीं, लेकिन अब उनकी जगह कंक्रीट के ढांचे ले चुके हैं। इससे फ्लैश फ्लड का खतरा और पानी के ट्रीटमेंट की लागत दोनों बढ़ गए हैं।
भविष्य की रणनीति
अब प्रशासन कैचमेंट एरिया के पुनरुद्धार और वाटर रियूज (Water Reuse) जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है। आने वाले समय में मुख्य ध्यान इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और बदलती पर्यावरणीय स्थितियों के साथ तालमेल बिठाने पर होगा, ताकि भविष्य में जल आपूर्ति को स्थिर किया जा सके।
