वर्ल्ड बैंक की नई रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि दक्षिण एशिया में युवाओं की बढ़ती आबादी का फायदा खत्म हो रहा है। अनुमान है कि साल 2050 तक GDP में डेमोग्राफिक योगदान गिरकर महज **0.1%** रह जाएगा, जो आने वाले समय में बड़ी आर्थिक चुनौतियां पैदा करेगा।
तेजी से बदलती डेमोग्राफिक्स
वर्ल्ड बैंक की नवंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया की अब तक की सबसे बड़ी ताकत—उसकी युवा आबादी—अब तेजी से ढलान पर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह क्षेत्र बाकी दुनिया की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बूढ़ा हो रहा है। अनुमान के मुताबिक, साल 2049 तक यहां की 14% आबादी 65 वर्ष या उससे अधिक की हो जाएगी। वर्किंग-एज आबादी के साल 2034 तक अपने पीक (Peak) पर पहुंचने की उम्मीद है, जिसके बाद उत्पादकता (Productivity) बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी।
आर्थिक और फिजिकल चुनौतियां
आने वाले समय में जीडीपी ग्रोथ के लिए केवल काम करने वाले हाथों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा संकेत है कि भविष्य की ग्रोथ अब तकनीक और कैपिटल इन्वेस्टमेंट से आएगी। वर्तमान में, इस क्षेत्र के सामने फिस्कल प्रेशर (Fiscal Pressure) बढ़ा हुआ है क्योंकि एक वृद्ध आबादी के लिए हेल्थकेयर और सोशल सेफ्टी नेट तैयार करने का भारी खर्च सरकार पर पड़ेगा।
इसके अलावा, स्ट्रक्चरल समस्याएं भी आड़े आ रही हैं:
- 88% वर्कफोर्स इनफॉर्मल सेक्टर (Informal Sector) में है, जिससे टैक्स रेवेन्यू कम होता है।
- महिलाओं की लेबर फोर्स में भागीदारी अभी भी बेहद कम है।
- साल 2027 तक रीजनल इकोनॉमिक ग्रोथ के 6.7% पर सुस्त होने का अनुमान है।
आगे की राह
जो इंडस्ट्रीज अब तक सस्ते लेबर पर निर्भर थीं, उन्हें आने वाले सालों में भारी दबाव का सामना करना पड़ सकता है। अब देश की अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाने के लिए लेबर मार्केट को फॉर्मलाइज करने, स्किल्स को बेहतर बनाने और ऑटोमेशन पर जोर देने की जरूरत है। निवेशकों को आने वाले समय में सरकारी लेबर रिफॉर्म्स और हेल्थकेयर बजट से जुड़े अपडेट्स पर कड़ी नजर रखनी होगी क्योंकि यही तय करेंगे कि यह क्षेत्र इस बड़े आर्थिक बदलाव को कितनी मजबूती से झेल पाता है।
