टैक्स और सुविधाओं का खेल: स्वीडन की तुलना में भारत में क्यों है ज़्यादा परेशानी?

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AuthorNeha Patil|Published at:
टैक्स और सुविधाओं का खेल: स्वीडन की तुलना में भारत में क्यों है ज़्यादा परेशानी?

स्वीडन में रह रहे एक भारतीय पेशेवर की सोशल मीडिया पोस्ट ने भारत में टैक्स और पब्लिक सर्विस को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। ये चर्चा देश के सैलरीड क्लास की उस चिंता को दर्शाती है कि वे जो टैक्स भरते हैं, क्या उन्हें उसके बदले अच्छी सुविधाएं मिल पा रही हैं या नहीं।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

स्वीडन में रह रहीं एक भारतीय HR प्रोफेशनल, Kritika Sakoriya, ने हाल ही में एक पोस्ट शेयर की, जिसने भारत में टैक्सपेयर्स के बीच पब्लिक सर्विस की वैल्यू को लेकर एक ज़ोरदार चर्चा शुरू कर दी है। Kritika का कहना है कि स्वीडन में इनकम टैक्स 30-35% तक हो सकता है, लेकिन वहां की सरकार नागरिकों को यूनिवर्सल हेल्थकेयर, फ्री एजुकेशन और पेड पैरेंटल लीव जैसी कई बड़ी सुविधाएं देती है।

यह बात भारत में रहने वाले कई सैलरीड लोगों के लिए सोचने वाली है, जो अक्सर इस बात से परेशान रहते हैं कि वे इतना ज़्यादा डायरेक्ट टैक्स भरने के बाद भी इंफ्रास्ट्रक्चर और सोशल सर्विस के मामले में वो क्वालिटी नहीं पाते, जिसकी वे उम्मीद करते हैं।

क्या टैक्स रेट ज़रूरी है या सर्विस की क्वालिटी?

इस बहस का मुख्य मुद्दा यही है कि क्या टैक्स रेट को सिर्फ इस आधार पर देखना चाहिए कि कितना प्रतिशत पैसा कट रहा है, या फिर इस बात पर कि उसके बदले में किस क्वालिटी की सेवाएं मिल रही हैं। स्वीडन जैसे देशों में, लोगों को लगता है कि उनके टैक्स के पैसे से ही पब्लिक प्लेसेस और सोशल सिक्योरिटी सिस्टम अच्छे से चलता है।

वहीं, भारत में कई प्रोफेशनल का मानना है कि डायरेक्ट इनकम टैक्स, GST और दूसरे सेस (cesses) को मिला दें, तो उनका टैक्स का बोझ काफी ज़्यादा हो जाता है। कई लोग कहते हैं कि इतने टैक्स के बावजूद पब्लिक सर्विस की क्वालिटी में कोई खास सुधार नहीं दिखता, जिससे मिडिल क्लास में निराशा है।

इकोनॉमिक्स पर आम लोगों की राय

यह बातचीत इस बात का भी संकेत है कि कैसे भारतीय प्रोफेशनल, खासकर जो महंगाई और मुश्किल टैक्स स्ट्रक्चर से जूझ रहे हैं, वो अब इकोनॉमिक्स पर ज़्यादा चर्चा कर रहे हैं। हाल की ऑनलाइन बातों में ऐसी ही शिकायतें सामने आई हैं, जहां कुछ लोगों ने बताया कि डिविडेंड (dividend) और इंटरेस्ट (interest) से होने वाली कमाई पर भी कई तरह के टैक्स लगते हैं, जिससे नेट कमाई पर असर पड़ता है।

ये बहसें दिखाती हैं कि सैलरीड क्लास के लिए आज के महंगे माहौल में अपनी नेट इनकम को मैनेज करना कितना मुश्किल हो गया है। हालांकि, अलग-अलग देशों की तुलना करना मुश्किल होता है क्योंकि उनके इकोनॉमी के साइज़, पॉपुलेशन और सरकारी खर्च की प्राथमिकताएं अलग-अलग होती हैं। लेकिन इस तरह के पोस्ट का वायरल होना यह दिखाता है कि लोग पब्लिक फंड के सही इस्तेमाल और भारतीय निवेशकों व कर्मचारियों की पर्सनल वेल्थ पर इसके असर को लेकर काफी चिंतित हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.