वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इंटरनेशनल टैक्स रिसर्च एंड एनालिसिस फाउंडेशन (ITRAF) से आग्रह किया है कि वे भारत के बदलते टैक्स ढांचे के लिए सबूत-आधारित शोध प्रदान करें। उन्होंने जोर दिया कि पॉलिसी केवल सेक्टर-विशिष्ट मांगों से ऊपर उठकर लंबी अवधि की आर्थिक स्थिरता पर केंद्रित होनी चाहिए।
बेंगलुरु में आयोजित आठवीं इंटरनेशनल टैक्स कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए, केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ITRAF को भारत की फिस्कल प्लानिंग में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया। यह कदम 'Income-tax Act, 2025' की ओर बढ़ते भारत के टैक्स फ्रेमवर्क को और अधिक मजबूत बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
डेटा पर क्यों है जोर?
वित्त मंत्री ने कहा कि वर्तमान में अधिकांश टैक्स परामर्श केवल कुछ चुनिंदा उद्योगों को टैक्स में छूट दिलाने तक सीमित रहते हैं। उन्होंने विशेषज्ञों से मांग की कि वे इस बात पर ठोस डेटा पेश करें कि टैक्स में बदलाव का रेवेन्यू और कंप्लायंस कॉस्ट पर क्या असर पड़ेगा। इस 'एविडेंस-बेस्ड' अप्रोच से सरकार ऐसी टैक्स नीतियां बना पाएगी, जिनमें विवाद कम और स्थिरता अधिक होगी।
निवेशकों के लिए क्यों है यह जरूरी?
किसी भी अर्थव्यवस्था में 'टैक्स पॉलिसी स्टेबिलिटी' लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट के लिए सबसे बड़ी शर्त होती है। सरकार इस समय एक नाजुक संतुलन बना रही है—जहाँ एक तरफ सरकारी खजाने के लिए रेवेन्यू जुटाना है, तो दूसरी तरफ बिजनेस ग्रोथ को भी सपोर्ट करना है। ग्लोबल अनिश्चितताओं और क्रूड ऑयल व फर्टिलाइजर्स की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच यह काम और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है।
टैक्स संधियों का आधुनिकीकरण
सीतारमण ने मॉरीशस, सिंगापुर और साइप्रस के साथ फिर से टैक्स संधियों पर बातचीत करने का जिक्र किया। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि भारत को कैपिटल गेन्स पर स्रोत (source) पर टैक्स लगाने का अधिकार मिले। साथ ही, अतीत में Securities Transaction Tax (STT) जैसे बदलावों ने बाजार में जो हलचल पैदा की थी, उसे देखते हुए सरकार अब भविष्य में ऐसे नियमों को प्राथमिकता देगी जो कानून को सरल बनाएं और कानूनी विवादों को कम करें।
