वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने चीन द्वारा भारतीय निर्यात पर लगाए गए नॉन-टैरिफ बैरियर्स पर चिंता जताई है। वहीं, अमेरिका के साथ प्रस्तावित ट्रेड डील कानूनी ड्राफ्टिंग के चरण में पहुंच गई है, जो भारतीय कंपनियों के लिए एक बड़ी खबर है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बीजिंग के साथ व्यापारिक रिश्तों पर गंभीर चिंता जाहिर की है। उन्होंने बताया कि नॉन-टैरिफ बैरियर्स भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी बाधा बने हुए हैं। इसमें फाइटोसेनेटरी नियम, क्वालिटी सर्टिफिकेशन और इम्पोर्ट लाइसेंसिंग जैसी जटिल प्रक्रियाएं शामिल हैं, जो फार्मास्यूटिकल्स, प्रोसेस्ड फूड और कृषि उत्पादों के लिए चीनी बाजार में प्रवेश मुश्किल बना रही हैं। हालांकि भारत लगातार द्विपक्षीय व्यापार घाटे को कम करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ये बाधाएं अभी भी एक बड़ा बॉटलनेक बनी हुई हैं।
अमेरिका के साथ ट्रेड डील में प्रगति
चीन के साथ व्यापारिक तनाव के बीच, अमेरिका के साथ नई ट्रेड डील पर काम तेजी से चल रहा है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के संकेतों के अनुसार, इस समझौते का शुरुआती चरण अब कानूनी ड्राफ्टिंग (Legal Drafting) स्टेज में है। निवेशकों के लिए यह एक बड़ी राहत की बात हो सकती है, क्योंकि इससे आईटी सर्विसेज, फार्मा और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को अमेरिकी बाजार में ज्यादा स्टेबल एक्सेस मिलने की उम्मीद है।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकार का जोर
IMF-वर्ल्ड बैंक की बैठकों में वित्त मंत्री ने भारत की घरेलू आर्थिक रणनीति को डिफेंड किया। सरकार का स्पष्ट मानना है कि महामारी के बाद 'कैश हैंडआउट्स' के बजाय इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करना बेहतर है। सड़कों, पोर्ट्स और रेलवे पर किया जा रहा सरकारी निवेश प्राइवेट सेक्टर के लिए लॉजिस्टिक्स कॉस्ट को कम कर रहा है, जिससे कंस्ट्रक्शन, सीमेंट और स्टील सेक्टर की कंपनियों को सीधा फायदा मिल रहा है।
BRICS और विदेश नीति
वित्त मंत्री ने यह भी साफ किया कि BRICS एक मल्टीलेटरल आर्थिक सहयोग का प्लेटफॉर्म है, न कि पश्चिमी देशों के खिलाफ कोई मोर्चा। भारत अपनी विदेश नीति में अमेरिका और G7 देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखते हुए उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के साथ भी अपने आर्थिक संबंधों को मजबूत कर रहा है। निवेशकों को अब अमेरिकी ट्रेड डील फाइनल होने की टाइमलाइन और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के निष्पादन (Execution) पर नजर रखनी चाहिए।
