भारतीय शेयर बाजार में पिछले दो सालों से सुस्ती छाई हुई है और Sensex अपने **2026** के पीक लेवल से **14%** नीचे कारोबार कर रहा है। इस 'टाइम करेक्शन' के कारण अब इंडेक्स का P/E रेश्यो गिरकर **19.8x** पर आ गया है, जो भारी FII बिकवाली के बावजूद मार्केट को ज्यादा संतुलित बनाता है।
भारतीय शेयर बाजार, जिसे Sensex के जरिए समझा जा सकता है, पिछले दो सालों से एक बड़े कंसोलिडेशन फेज से गुजर रहा है। बाजार में भारी गिरावट के बजाय, एक 'टाइम करेक्शन' देखने को मिला है, जहां शेयर की कीमतें स्थिर हैं लेकिन कंपनियों के मुनाफे बढ़ रहे हैं। इससे महंगे वैल्युएशन अब थोड़े तार्किक स्तर पर आ गए हैं।
वैल्युएशन रीसेट और FII का दबाव
बाजार की इस सुस्ती के पीछे सबसे बड़ा कारण विदेशी निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली है। पिछले तीन सालों में FIIs ने भारतीय बाजार से कुल ₹10 लाख करोड़ की निकासी की है, जिसका बड़ा हिस्सा वैश्विक स्तर पर AI आधारित निवेश की ओर मुड़ गया है। राहत की बात यह है कि घरेलू निवेशकों की SIP के जरिए निरंतर निवेश ने बाजार को गिरने से थामे रखा है। अब इंडेक्स का P/E रेश्यो 19.8x पर है, जो पहले के ऊंचे स्तरों की तुलना में काफी बेहतर है।
सेक्टर का हाल और भविष्य की राह
आईटी (IT) और बैंकिंग सेक्टर का बड़ा वेटेज होने के कारण इंडेक्स पर दबाव बना हुआ है। आईटी कंपनियां AI टूल्स की वजह से अपने बिजनेस मॉडल को बदलने की चुनौती से जूझ रही हैं, वहीं बैंकिंग सेक्टर मार्जिन दबाव और विलय के बाद की जटिलताओं को सुलझाने में लगा है।
तकनीकी चार्ट पर गौर करें तो बाजार 73,500 से 74,000 के जोन पर सपोर्ट ले रहा है, जबकि ऊपर की ओर 79,300 से 80,000 का स्तर एक मजबूत रेजिस्टेंस बना हुआ है। बाजार में फिर से तेजी के लिए केवल लिक्विडिटी ही नहीं, बल्कि कॉरपोरेट मुनाफे में जबरदस्त रफ्तार की दरकार है। निवेशकों के लिए यही सलाह है कि इंडेक्स के मूवमेंट पर नजर रखने के बजाय अब उन चुनिंदा कंपनियों पर दांव लगाएं, जिनका डोमेस्टिक कंजम्पशन मजबूत है और जिनके पास प्राइसिंग पावर है।
