मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच गहराते संघर्ष के चलते क्रूड ऑयल की कीमतें **$96** प्रति बैरल के पास पहुँच गई हैं। इस ऊर्जा संकट के कारण भारतीय बाजार में बिकवाली हावी रही, जिससे ऑटो और टेक्नोलॉजी शेयरों में बड़ा दबाव देखा गया।
बुधवार, 2 सितंबर 2026 को भारतीय शेयर बाजार ने मिडिल ईस्ट में बढ़ती जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता के चलते गिरावट दर्ज की। इस माहौल में BSE Sensex और NSE Nifty 50 दोनों ही लाल निशान में बंद हुए, जहाँ Nifty 24,000 के अहम स्तर के नीचे फिसल गया। इस मंदी के पीछे सबसे बड़ा ट्रिगर वैश्विक स्तर पर क्रूड ऑयल की कीमतों में आया उछाल है, जो $96 प्रति बैरल के स्तर तक पहुँच गया है।
सेक्टर पर असर और इनपुट कॉस्ट
एनर्जी प्राइसेस में आई इस तेजी का सीधा असर कच्चे माल पर निर्भर रहने वाले सेक्टर पर पड़ा है। Nifty Auto इंडेक्स में 2% से अधिक की गिरावट दिखी, क्योंकि निवेशकों को डर है कि फ्यूल की बढ़ती कीमतें कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन को दबा सकती हैं। इसी तरह, Nifty Media और IT इंडेक्स भी दबाव में रहे, क्योंकि महंगाई बढ़ने से कंपनियों की कमाई और लोगों की खर्च करने की क्षमता पर असर पड़ने की आशंका है।
इसके उलट, बाजार में 'डिफेंसिव रोटेशन' देखने को मिला। ONGC और Coal India जैसी ऑयल और गैस कंपनियों के शेयरों में निवेशकों ने रुचि दिखाई क्योंकि उन्हें अपनी बिक्री से बेहतर रिटर्न की उम्मीद है। वहीं, Adani Ports और Power Grid जैसे लार्ज-कैप शेयरों ने बाजार को थोड़ा सहारा दिया।
ग्लोबल माहौल और निवेशकों के लिए आउटलुक
भारतीय निवेशकों के लिए क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतें एक दोहरी चुनौती हैं। चूंकि भारत भारी मात्रा में क्रूड ऑयल इंपोर्ट करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल देश के आयात बिल को बढ़ाता है और रुपये पर दबाव डालता है। साथ ही, अमेरिका में बॉन्ड यील्ड्स के बढ़ने से विदेशी निवेशक इमर्जिंग मार्केट्स से पैसा निकाल कर सुरक्षित सरकारी बॉन्ड्स की ओर रुख कर रहे हैं।
बाजार के 'डर के मीटर' यानी India VIX में 3% से ज्यादा की उछाल यह दर्शाती है कि आने वाले दिनों में बाजार में भारी उठा-पटक जारी रह सकती है।
आगे क्या करें?
बाजार की अगली चाल क्रूड ऑयल की स्थिरता और मिडिल ईस्ट की स्थितियों पर निर्भर करेगी। यदि क्रूड ऑयल लंबे समय तक $95 के ऊपर बना रहता है, तो महंगाई का खतरा बढ़ सकता है, जिससे केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरों पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है। फिलहाल निवेशकों को डिफेंसिव सेक्टर और वोलेटिलिटी पर बारीकी से नजर रखने की सलाह दी जाती है।
