नए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) लागू होने के तीन दिन बाद Sensex और Nifty इंडेक्स के बीच का फासला कम होता दिख रहा है। 20 मिनट की इस नई ऑक्शन मैकेनिज्म से शुरू में थोड़ी वोलैटिलिटी (Volatility) देखी गई थी। हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि RBI के नए नियम, जो बैंकों के कैपिटल मार्केट एक्सपोजर (Capital Market Exposure) को सीमित करते हैं, बाज़ार की गहराई और लिक्विडिटी (Liquidity) पर असर डाल रहे हैं।
Sensex-Nifty में आ रही स्थिरता
5 अगस्त 2026 तक, BSE Sensex और NSE Nifty के बीच प्रदर्शन का अंतर लगातार तीसरे दिन कम हुआ है। यह स्थिरता 3 अगस्त को लागू हुए नए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) के बाद आई है, जिसने डेरिवेटिव्स सेगमेंट में ट्रेड होने वाले स्टॉक्स की क्लोजिंग प्राइस (Closing Price) की गणना के तरीके को बदल दिया है।
नए सिस्टम के तहत, पहले 30 मिनट की वॉल्यूम-वेटेड एवरेज प्राइस (VWAP) की गणना की जगह अब एक सिंगल-प्राइस इक्विलिब्रियम ऑक्शन (Single-Price Equilibrium Auction) का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह ऑक्शन 3:15 PM से 3:35 PM के बीच 20 मिनट की विंडो में होता है। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य ट्रेडिंग डे के अंत में प्राइस डिस्कवरी (Price Discovery) को सभी एक्सचेंजों पर ज्यादा ट्रांसपेरेंट (Transparent) और एक समान बनाना है। हालांकि, शुरुआत में इस बदलाव से दोनों बड़े इंडेक्स के बीच कुछ अंतर देखे गए, क्योंकि ट्रेडर्स और एल्गोरिदम ने नई नॉन-कंटीन्यूअस प्राइसिंग मैकेनिज्म (Non-continuous pricing mechanism) के हिसाब से अपनी स्ट्रेटेजी (Strategy) एडजस्ट की।
बुधवार को Nifty ने सेशन 24,625 पर क्लोज किया, जबकि Sensex 78,581 पर बंद हुआ। यह घटता हुआ अंतर बताता है कि मार्केट पार्टिसिपेंट्स (Market Participants), खासकर आर्बिट्रेजर्स (Arbitrageurs), उन प्राइस गैप्स (Price Gaps) को सफलतापूर्वक ठीक कर रहे हैं जो रोलआउट के शुरुआती दिनों में बने थे। दोनों एक्सचेंजों के बीच प्राइस के अंतर का फायदा उठाकर, ये ट्रेडर्स ऑक्शन विंडो में इक्विलिब्रियम (Equilibrium) और लिक्विडिटी (Liquidity) को बेहतर बनाने में मदद कर रहे हैं।
बाज़ार की गहराई पर भी है दबाव
CAS की मैकेनिज्म (Mechanism) एडजस्ट हो रही है, लेकिन एक्सपर्ट्स ने कुछ गहरे स्ट्रक्चरल चैलेंजेस (Structural Challenges) की ओर भी इशारा किया है, जिन्हें इस रोलआउट ने उजागर किया है। Zerodha के फाउंडर और CEO, Nithin Kamath, ने कहा कि इस बदलाव का समय बाज़ार पर पड़ रहे व्यापक दबाव के साथ हो रहा है। खास तौर पर, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के वो नए रेगुलेशन्स (Regulations), जो बैंकों के कैपिटल मार्केट एक्सपोजर को सीमित करते हैं और ब्रोकर्स के लिए लेंडिंग नॉर्म्स (Lending Norms) को सख्त करते हैं, बाज़ार की कुल गहराई को प्रभावित कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए, सबसे बड़ी चिंता बाज़ार की शैलोनेस (Shallowness) बनी हुई है। कैश मार्केट (Cash Market) में कम पार्टिसिपेंट्स और शॉर्ट-सेलिंग स्ट्रेटेजी (Short-selling Strategy) को लागू करने में कठिनाई, जब बड़े बदलाव पेश किए जाते हैं तो वोलैटिलिटी (Volatility) पैदा कर सकती है। जब लिक्विडिटी (Liquidity) कम होती है, तो 20 मिनट की ऑक्शन विंडो के दौरान ऑर्डर में छोटे असंतुलन (Order Imbalances) भी ऐसे प्राइस स्विंग्स (Price Swings) का कारण बन सकते हैं जो जरूरी नहीं कि व्यापक मार्केट ट्रेंड (Market Trend) को दर्शाते हों। यह खासकर इंडेक्स फंड्स (Index Funds) और एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETFs) में निवेश करने वालों के लिए प्रासंगिक है, क्योंकि ये प्रोडक्ट्स अपने बेंचमार्क (Benchmark) को ट्रैक करने के लिए सटीक क्लोजिंग प्राइस पर निर्भर करते हैं। अगर एक्सचेंजों के बीच प्राइस के अंतर बने रहते हैं, तो इन फंड्स के लिए ट्रैकिंग एरर (Tracking Errors) बढ़ सकती है।
आगे चलकर, बाज़ार संभवतः इस बात पर ध्यान केंद्रित करेगा कि क्या मौजूदा स्थिरता बनी रहती है या स्ट्रक्चरल कंस्ट्रेंट्स (Structural Constraints) - जैसे कि RBI के टाइट एक्सपोजर नॉर्म्स (Tight Exposure Norms) - प्राइस डिस्कवरी (Price Discovery) को प्रभावित करते रहते हैं। निवेशक आने वाले हफ्तों में लिक्विडिटी पैटर्न (Liquidity Patterns) के विकास पर नजर रख सकते हैं, क्योंकि यह इंडस्ट्री ऑक्शन-आधारित क्लोजिंग मैकेनिज्म से अधिक परिचित हो जाती है।
