भारतीय शेयर बाज़ार में एक अनोखा ट्रेंड देखने को मिल रहा है, जहाँ पिछले 4 दिनों से सेंसेक्स (Sensex) और निफ्टी (Nifty) अलग-अलग क्लोजिंग लेवल दिखा रहे हैं। यह बदलाव 3 अगस्त को शुरू हुई नई क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (Closing Auction Session) के कारण हुआ है।
नई क्लोजिंग ऑक्शन का क्या है खेल?
यह नई प्रणाली डेरिवेटिव (derivatives) वाले स्टॉक्स के प्राइस डिस्कवरी (price discovery) को बेहतर बनाने के लिए लाई गई है। पहले, ट्रेडिंग सेशन के आखिरी 30 मिनट के वॉल्यूम-वेटेड एवरेज प्राइस (VWAP) के आधार पर क्लोजिंग प्राइस तय होता था। लेकिन अब, 3:15 p.m. से 3:35 p.m. तक एक सिंगल-प्राइस ऑक्शन विंडो (single-price auction window) में खरीद और बिक्री के ऑर्डर मैच किए जाते हैं, जिससे एक इक्विलिब्रियम प्राइस (equilibrium price) तय होता है।
क्यों हो रहा है इंडेक्स में गैप?
इस नई प्रक्रिया को अपनाने में अभी बाज़ार थोड़ा समय ले रहा है। सामान्य ट्रेडिंग घंटों की तुलना में इस 20 मिनट की ऑक्शन विंडो में अभी कम पार्टिसिपेशन है। ऐसे में, कम वॉल्यूम के कारण छोटे ऑर्डर भी फाइनल इंडेक्स वैल्यू पर ज़्यादा असर डाल रहे हैं। चूँकि सेंसेक्स और निफ्टी में अलग-अलग स्टॉक्स शामिल हैं, इसलिए इस नई ऑक्शन का असर दोनों इंडेक्स पर एक जैसा नहीं हो रहा, जिससे यह अस्थायी गैप बन रहा है।
क्या है जानकारों का मानना?
बाज़ार के जानकारों का कहना है कि यह एक अस्थायी एडजस्टमेंट (temporary adjustment) का दौर है। जैसे-जैसे इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (institutional investors) और आर्बिट्रेजर्स (arbitrageurs) इस नई विंडो में ज़्यादा एक्टिव होंगे, प्राइस डिस्कवरी और स्टेबल होगी। उम्मीद है कि आने वाले हफ्तों में, खासकर डेरिवेटिव सेटलमेंट्स (derivative settlements) के बाद, यह अंतर कम हो जाएगा।
