1 अक्टूबर 2026 को भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट देखी गई। विदेशी निवेशकों की निरंतर बिकवाली (FII selling), US बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने बाजार की धारणा को कमजोर कर दिया है, जिसका सबसे बुरा असर ऑटो सेक्टर पर पड़ा है।
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026 को भारतीय शेयर बाजारों में जबरदस्त बिकवाली देखी गई। सेंसेक्स (Sensex) और निफ्टी (Nifty) में भारी दबाव के पीछे मुख्य रूप से विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की तरफ से की जा रही लगातार बिकवाली है। ग्लोबल फंड्स के इस रुख ने लार्ज-कैप और मिड-कैप दोनों ही सेगमेंट के वैल्यूएशंस को प्रभावित किया है।
गिरावट के मुख्य कारण
बाजार पर इस वक्त दो बड़े मैक्रोइकॉनॉमिक फैक्टर हावी हैं। पहला, US 10-वर्षीय ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड का 5.3% के स्तर के करीब बने रहना। जब US बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो निवेशक इमर्जिंग मार्केट्स जैसे भारत से पैसा निकाल कर सुरक्षित विकल्पों की तरफ भागते हैं। दूसरा, मिडिल ईस्ट में जारी भू-राजनीतिक तनाव के चलते कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में अस्थिरता है। तेल की बढ़ती कीमतें भारत के इंपोर्ट बिल को बढ़ाती हैं और इन्फ्लेशन का दबाव भी लाती हैं, जो कंपनियों के मार्जिन के लिए चिंता का विषय है।
ऑटो सेक्टर का बुरा हाल
गिरावट में ऑटोमोबाइल सेक्टर सबसे पीछे नजर आया। फेस्टिव सीजन में डिमांड को लेकर निवेशकों की उम्मीदें अब फिर से बदली जा रही हैं। ऑटो जैसे कंज्यूमर डिस्क्रीशनरी सेक्टर में गिरावट इसलिए भी तेज है क्योंकि निवेशक हाई-इंटरेस्ट रेट के माहौल में पैसा लगाने से कतरा रहे हैं और प्रॉफिट बुकिंग पर जोर दे रहे हैं।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
आने वाले समय में बाजार की चाल समझने के लिए FIIs की एक्टिविटी पर नजर रखना जरूरी है। यदि घरेलू संस्थागत निवेशक (DIIs) सपोर्ट देते हैं, तो गिरावट को कुछ हद तक सहारा मिल सकता है। इसके अलावा, क्रूड ऑयल के भाव भी रुपये की सेहत के लिए क्रिटिकल रहेंगे। अर्निंग सीजन नजदीक है, ऐसे में कंपनियां किस तरह लागत (Input cost) को मैनेज करती हैं, यह तय करेगा कि बाजार यहां से संभलेगा या और फिसलेगा। लंबी अवधि के निवेशकों को फिलहाल कम कर्ज वाली और मजबूत कैश फ्लो वाली कंपनियों पर फोकस करना चाहिए।
