भारत के चार राज्य अब केवल सब्सिडी पर निर्भर रहने के बजाय ऑपरेशनल एफिशिएंसी (operational efficiency) पर जोर दे रहे हैं। गुजरात, असम, ओडिशा और कर्नाटक अब कंपनियों को प्लग-एंड-प्ले जमीन और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर देकर चिप प्रोजेक्ट्स को तेजी से धरातल पर उतारने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत में सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के लिए राज्यों के बीच होड़ मच गई है। अब केवल टैक्स छूट या सब्सिडी ही नहीं, बल्कि काम करने की आसानी यानी 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' सबसे बड़ा फैक्टर बन गया है। चिप मैन्युफैक्चरिंग जैसे कैपिटल-इंटेंसिव बिजनेस के लिए प्रोजेक्ट शुरू होने में लगने वाला समय ही सबसे बड़ा निवेश होता है, जिसे कम करने के लिए राज्य नई पहल कर रहे हैं।
राज्यों की नई पहल
असम सरकार ने टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स (Tata Electronics) के प्रोजेक्ट को समय पर पूरा करने के लिए साप्ताहिक निगरानी प्रणाली शुरू की है। साथ ही, 'प्लग-एंड-प्ले' इंडस्ट्रियल पार्क बनाए जा रहे हैं ताकि कंपनियों को बुनियादी ढांचे के लिए इंतजार न करना पड़े।
गुजरात ने 'गुजरात सेमीकंडक्टर इलेक्ट्रॉनिक्स मिशन' का गठन किया है, जो सिंगल विंडो की तरह काम कर रहा है। वहीं, ओडिशा ने पावर कॉस्ट को कम करने पर ध्यान दिया है। राज्य ₹4.50 प्रति यूनिट की दर से औद्योगिक बिजली देने की तैयारी कर रहा है और 1,000 एकड़ का टेक्नोलॉजी पार्क विकसित कर रहा है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह अहम?
सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में देरी का मतलब है कैपिटल कॉस्ट का बढ़ना और प्रॉफिट मार्जिन का घटना। राज्यों द्वारा पहले से क्लियर की गई जमीन और इंफ्रास्ट्रक्चर देने से निवेशकों का रिस्क कम हुआ है। हालांकि, कुशल वर्कफोर्स की उपलब्धता अभी भी एक चुनौती है। इसके लिए IIT गांधीनगर, IIT गुवाहाटी और C-DAC के साथ मिलकर टैलेंट पाइपलाइन तैयार की जा रही है।
सेक्टर के सामने चुनौतियां
इन्वेस्टर्स को यह ध्यान रखना होगा कि यह सेक्टर न केवल जमीन, बल्कि पानी और स्थिर ग्लोबल सप्लाई चेन पर भी निर्भर है। भले ही सरकारी मंजूरी जल्दी मिल जाए, लेकिन कच्चे माल की उपलब्धता और चिप की वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव जैसे जोखिम बने रहेंगे। निवेशकों को प्रोजेक्ट्स के कमीशनिंग टाइमलाइन पर अपनी नजर रखनी चाहिए।
