Secondary Steel Makers: मुनाफे की नई राह, कंपनियां बढ़ा रही हैं एफिशिएंसी

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AuthorAditya Rao|Published at:
Secondary Steel Makers: मुनाफे की नई राह, कंपनियां बढ़ा रही हैं एफिशिएंसी

भारतीय सेकेंडरी स्टील कंपनियां अब अपनी प्रोडक्शन लागत कम करने के लिए बैकवर्ड इंटीग्रेशन और कैप्टिव पावर प्लांट पर बड़ा दांव लगा रही हैं। इस बदलाव से इंडस्ट्री के ऑपरेटिंग मार्जिन में **6.6%** तक के उछाल की उम्मीद है।

सेकेंडरी स्टील प्रोड्यूसर्स अब अपनी रणनीति बदल रहे हैं ताकि एनर्जी प्राइस की उठा-पटक से मुनाफे को बचाया जा सके। अब कंपनियां सिर्फ अपनी मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी बढ़ाने के बजाय बैकवर्ड इंटीग्रेशन और अपने खुद के कैप्टिव पावर प्लांट पर भारी खर्च कर रही हैं। इससे ग्रिड और अनस्टेबल सप्लाई चेन पर उनकी निर्भरता कम होगी।

मार्जिन में सुधार का गणित

इंडस्ट्री डेटा के मुताबिक, जो कंपनियां इंटीग्रेटेड हैं, उन्हें प्रति टन ₹1,500 से ₹2,000 तक का अतिरिक्त EBITDA प्रॉफिट मिल रहा है। इस साल सेकेंडरी स्टील सेक्टर में इंटीग्रेटेड कैपेसिटी का हिस्सा पिछले साल के 27% से बढ़कर 33% होने की उम्मीद है।

भारी निवेश और डिमांड का सपोर्ट

कंपनियां इस बदलाव के लिए करीब ₹3,000 करोड़ से ₹3,500 करोड़ का कैपिटल एक्सपेंडिचर (CAPEX) कर रही हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब कंस्ट्रक्शन सेक्टर में 'लॉन्ग स्टील' की मांग में करीब 7% की बढ़ोतरी का अनुमान है। सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स इस ग्रोथ के मुख्य इंजन हैं।

जोखिम और चुनौतियां

हालांकि, ये प्रोजेक्ट्स काफी कैपिटल-इंटेंसिव हैं और इनका पूरा फायदा मिलने में लंबा समय लग सकता है। इसके अलावा, ग्लोबल मार्केट में उथल-पुथल का असर रॉ मटेरियल की सप्लाई पर पड़ सकता है। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां अपना कर्ज कैसे मैनेज करती हैं और क्या उनकी कॉस्ट कंट्रोल की रणनीति तिमाही नतीजों में मार्जिन सुधार के रूप में दिखाई देती है या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.