S&P Global ने भारत को पावर और फ्यूल स्टोरेज पॉलिसी को एक साथ जोड़ने की सलाह दी है। इस एकीकृत ढांचे से देश को ग्लोबल एनर्जी झटकों से बचने और इंफ्रास्ट्रक्चर फंड्स के लिए एक नई निवेश कैटेगरी तैयार करने में मदद मिलेगी।
एकीकृत एनर्जी पॉलिसी की दरकार
S&P Global ने अपनी एडवाइजरी में कहा है कि भारत को अब बिखरी हुई एनर्जी प्लानिंग से हटकर एक यूनिफाइड और इंटीग्रेटेड स्टोरेज पॉलिसी की ओर बढ़ना चाहिए। इसका मकसद पावर स्टोरेज (जैसे बैटरी और पंप हाइड्रो) और फ्यूल स्टोरेज (जैसे कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस) के बीच के अंतर को खत्म करना है। इन सभी घटकों को एक जुड़े हुए इकोसिस्टम के तौर पर देखने से ग्लोबल सप्लाई चेन में आने वाली अस्थिरता से निपटने में एक मजबूत बफर तैयार होगा।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
यह सिफारिश निवेशकों के लिए बहुत अहम है क्योंकि यह एनर्जी स्टोरेज को एक अलग निवेश एसेट क्लास के तौर पर स्थापित करने का सुझाव देती है। यदि इसे लागू किया जाता है, तो यह पेंशन और इंफ्रास्ट्रक्चर फंड्स जैसे लॉन्ग-टर्म संस्थागत पूंजी को आकर्षित कर सकता है, जो अक्सर स्थिर और अनुमानित रिटर्न वाले प्रोजेक्ट्स की तलाश में रहते हैं।
मौजूदा चुनौतियां और रिस्क फैक्टर
भारत के रिफाइनिंग सेक्टर ने पहले ही फिस्कल बैलेंस बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई है। रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट के एक्सपोर्ट से कच्चे तेल के कुल इंपोर्ट खर्च का लगभग 25% हिस्सा कवर हो जाता है। साथ ही, सप्लाई रिस्क को मैनेज करने के लिए भारत अब 41 अलग-अलग देशों से कच्चा तेल खरीद रहा है।
हालांकि, चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं। इकॉनमी के लिए सबसे बड़ा जोखिम अभी भी कच्चे तेल, एलएनजी और एलपीजी का इंपोर्ट है। इन इंपोर्ट्स का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर गुजरता है, जो एक रणनीतिक रूप से संवेदनशील इलाका है। इसके अलावा, रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ बढ़ते कदम और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में कैपिटल की भारी लागत और जमीन अधिग्रहण जैसी दिक्कतें अब भी जारी हैं। निवेशक अब सरकार के उन फैसलों पर नजर रखेंगे जो इन स्टोरेज फैसिलिटीज के विकास को रफ्तार दे सकते हैं।
