सुप्रीम कोर्ट ने State Electricity Regulatory Commissions (SERCs) में लंबे समय से खाली पदों को लेकर 15 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया है। यह प्रशासनिक कमी Electricity Act का उल्लंघन है, जिससे टैरिफ रिवीज़न और कंपनियों की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी पर बड़ा संकट मंडरा रहा है।
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने देश के 15 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। मुख्य न्यायाधीश Surya Kant, जस्टिस Joymalya Bagchi और जस्टिस V. Mohana की बेंच ने NGO 'Energy Watchdog' की याचिका पर यह नोटिस जारी किया है। याचिका में साफ कहा गया है कि इन राज्यों में बिजली आयोग या तो पूरी तरह काम नहीं कर रहे हैं या फिर वहां जरूरी कानूनी सदस्य मौजूद नहीं हैं।
क्यों है यह बड़ा मामला?
यह विवाद सीधे तौर पर Electricity Act, 2003 और 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन है। कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि SERCs एक अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) निकाय हैं, इसलिए इनमें कानूनी योग्यता रखने वाले सदस्यों का होना अनिवार्य है। राज्यों की लापरवाही के कारण चेयरमैन और लीगल एक्सपर्ट्स की सीटें महीनों से खाली पड़ी हैं।
डिस्कॉम्स (DISCOMs) की मुश्किल
पावर सेक्टर के लिए यह 'रेगुलेटरी वैक्यूम' काफी जोखिम भरा है। चूंकि ये आयोग बिजली के दाम (Tariff) तय करने और शिकायतों के निपटारे के लिए जिम्मेदार होते हैं, इनके न होने से पारदर्शिता खत्म हो रही है। यदि रेगुलेटर ही नहीं होगा, तो डिस्कॉम्स के लिए सही समय पर टैरिफ बढ़ाना नामुमकिन हो जाता है। इसका सीधा असर उनकी मार्जिन और कर्ज पर पड़ रहा है, क्योंकि बढ़ती लागत का बोझ वे ग्राहकों पर नहीं डाल पा रहे हैं।
राज्यों की स्थिति
याचिका में कई राज्यों का जिक्र है। उदाहरण के तौर पर, तमिलनाडु में जून 2026 से सभी सीटें खाली हैं, जबकि आंध्र प्रदेश में न तो चेयरमैन है और न ही जरूरी तकनीकी सदस्य। इसके अलावा पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और झारखंड जैसे राज्य भी कोर्ट की रडार पर हैं। अब निवेशकों और स्टेकहोल्डर्स की नजरें इस पर टिकी हैं कि राज्य सरकारें इन पदों को भरने के लिए क्या समय-सीमा तय करती हैं।
