GDP Data: 'Missing' GDP की खबरों पर SBI Research का बड़ा खुलासा, जानिए क्या है पूरी सच्चाई

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
GDP Data: 'Missing' GDP की खबरों पर SBI Research का बड़ा खुलासा, जानिए क्या है पूरी सच्चाई

SBI Research ने स्पष्ट किया है कि भारत की GDP के आंकड़ों में 'गायब' आर्थिक गतिविधि का दावा गलत है। यह भ्रम बेस ईयर (Base Year) को **2011-12** से बदलकर **2022-23** करने के कारण उत्पन्न हुआ है, जो वास्तव में एक तकनीकी सुधार है न कि आर्थिक गिरावट।

हाल ही में सामने आई GDP की रिपोर्टों को लेकर बाजार में काफी चर्चा थी कि देश की जीडीपी से एक बड़ा हिस्सा 'गायब' हो गया है। SBI Research ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि यह चिंता केवल एक तकनीकी बदलाव का परिणाम है, न कि अर्थव्यवस्था में आई किसी कमजोरी का संकेत।\n\n### बेस ईयर बदलने से क्यों आया अंतर?\n\nअर्थशास्त्री GDP की गणना के लिए बेस ईयर को एक बेंचमार्क की तरह इस्तेमाल करते हैं। समस्या तब शुरू हुई जब बेस ईयर को 2011-12 की सीरीज से हटाकर नई 2022-23 की सीरीज में शिफ्ट किया गया। इन दोनों सीरीज के डेटा सोर्स और गणना के तरीके अलग हैं, इसलिए पुराने और नए आंकड़ों की तुलना करना सांख्यिकीय रूप से गलत है।\n\nSBI की रिपोर्ट के मुताबिक, नेशनल अकाउंट्स में इस तरह के संशोधन डेटा मैनेजमेंट का सामान्य हिस्सा हैं। FY09 के बाद से अब तक 70 क्वार्टर में 239 बार ऐसे संशोधन हो चुके हैं। इस बार Q1 FY23 से Q2 FY26 के बीच नॉमिनल GDP में ₹41.8 लाख करोड़ की जो गिरावट दिखाई दी, वह वास्तव में अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (Informal Economy) को बेहतर तरीके से कैप्चर करने के लिए किया गया डेटा रियलअलाइनमेंट है।\n\n### सेक्टर-वाइज स्थिति\n\nरिपोर्ट बताती है कि GVA (Gross Value Added) में हुई 95% गिरावट ट्रेड, होटल, ट्रांसपोर्ट और कम्युनिकेशन सेक्टर से जुड़ी है। इसके उलट, फाइनेंस, इंश्योरेंस और रियल एस्टेट सेक्टर में ₹13.6 लाख करोड़ का इजाफा दर्ज किया गया है। यह सुधार सरकार द्वारा ASUSE (Annual Survey of Unincorporated Sector Enterprises) और PLFS जैसे अधिक विस्तृत सर्वे के इस्तेमाल के कारण संभव हो पाया है।\n\n### मार्केट और निवेशकों के लिए क्या है संकेत?\n\nतकनीकी बहस से परे, भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार मजबूत बनी हुई है। भारत की रियल GDP में सालाना आधार पर 7.8% की ग्रोथ दर्ज की गई है। इसके अलावा, FY23 के बाद से प्राइवेट सेक्टर इन्वेस्टमेंट औसतन ₹3.5 लाख करोड़ सालाना रहा है, जो प्री-पेंडमिक लेवल से कहीं ज्यादा है। निवेशकों को सलाह है कि वे ग्लोबल जियोपॉलिटिकल तनाव और क्लाइमेट-रिलेटेड जोखिमों पर नजर रखें, क्योंकि आगे की ग्रोथ प्राइवेट इन्वेस्टमेंट की मजबूती पर टिकी है।

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