भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की रिसर्च विंग ने एक रिपोर्ट जारी की है, जिसके अनुसार भारत की रिटेल महंगाई दर 2026 के अंत तक यानी अक्टूबर-नवंबर में **6%** के पार जा सकती है। यह अगस्त के अनुमानित **4.7%** से काफी ज्यादा है। इस स्थिति को देखते हुए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ब्याज दरों को लेकर अपनी सतर्क नीति लंबे समय तक जारी रख सकता है।
महंगाई का अनुमान और RBI का रुख
SBI रिसर्च की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में रिटेल महंगाई दर 2026 के अक्टूबर और नवंबर महीनों में 6% के आंकड़े को पार कर सकती है। यह जुलाई में 4.45% और अगस्त के अनुमानित 4.7% की तुलना में एक बड़ा उछाल दिखाता है। हालांकि, यह अनुमान है कि यह बढ़ोतरी अस्थायी होगी और 2027 के चौथे फाइनेंशियल ईयर तक महंगाई दर 5% के करीब आ जाएगी।
RBI की ब्याज दरें और आगे की राह
फिलहाल, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने रेपो रेट 5.25% पर स्थिर रखा है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 5 अगस्त 2026 की बैठक के बाद कहा कि RBI डेटा पर आधारित निर्णय लेगा। केंद्रीय बैंक यह जानना चाहता है कि महंगाई लगातार ऊंची बनी रहती है या नहीं, तभी ब्याज दरों में कोई बदलाव का फैसला लिया जाएगा। निवेशकों के लिए इसका मतलब है कि RBI की प्राथमिकता महंगाई को टारगेट रेंज में रखना है, इसलिए ब्याज दरों में कटौती तुरंत होने की उम्मीद कम है।
महंगाई पर असर डालने वाले कारक
महंगाई में इस संभावित बढ़ोतरी की मुख्य वजह खाद्य आपूर्ति में दबाव माना जा रहा है। हालांकि, कुछ ऐसे कारक भी हैं जो स्थिति को संभालने में मदद कर सकते हैं। जुलाई के बाद से अच्छी बारिश के साथ बेहतर मानसून की स्थिति और 'इंडियन ओशन डिप्लो' (Indian Ocean Dipole) जैसी मौसम संबंधी घटनाएं, जो बारिश के पैटर्न को प्रभावित कर सकती हैं, अनाज उत्पादन में मदद करेंगी। इसके अलावा, सरकार का सिंचाई इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश भी कुछ कृषि क्षेत्रों में अनियमित बारिश के असर को कम कर रहा है।
निवेशकों पर असर
निवेशकों के लिए महंगाई का यह रुख एक अहम निगरानी का विषय है। यदि महंगाई उम्मीद से ज़्यादा समय तक ऊंची बनी रहती है, तो बैंकिंग सिस्टम में ब्याज दरें ऊंची रह सकती हैं। इससे जहां सेविंग करने वालों को फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर अच्छा ब्याज मिलता रहेगा, वहीं व्यवसायों और आम लोगों के लिए लोन लेना महंगा हो सकता है।
घरेलू कारकों के अलावा, अमेरिका के फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) की नीतियां भी भारतीय बाजारों को प्रभावित करती हैं। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड (US Treasury Yields) में बदलाव भारत में विदेशी निवेश के प्रवाह को प्रभावित कर सकते हैं। साथ ही, 'सेकंड-राउंड इफेक्ट्स' (second-round effects) की चिंता भी है, जहां खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी का असर अन्य वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ता है, जिससे महंगाई को काबू करना मुश्किल हो जाता है। SBI की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बाजार RBI के भविष्य के संकेतों से ज़्यादा, उसकी वास्तविक नीतियों पर ध्यान दे रहा है।
आने वाले महीनों में निवेशकों को मासिक कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) के आंकड़ों पर कड़ी नजर रखनी होगी। ये रिपोर्ट तय करेंगी कि महंगाई 6% के स्तर को पार करने के अनुमान की ओर बढ़ रही है या नहीं।
