रूस ने SWIFT को बायपास करने के लिए ब्लॉकचेन पर आधारित 'A7' नेटवर्क लॉन्च किया है। यह नेटवर्क रूबल-पेग्ड टोकन के जरिए क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट का दावा करता है, लेकिन इसके पीछे शैडो बैंकिंग और भारी रेगुलेटरी जोखिम छुपे हैं।
रूस ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों (Sanctions) से बचने के लिए एक नया ब्लॉकचेन प्लेटफॉर्म 'A7' तैयार किया है। 2022 में रूस के प्रमुख बैंकों को ग्लोबल बैंकिंग सिस्टम SWIFT से बाहर किए जाने के बाद, क्रेमलिन समर्थित Promsvyazbank ने मोल्दोवन के इलान शॉर के साथ मिलकर इसे विकसित किया है। यह सिस्टम 'A7A5' नामक डिजिटल टोकन का इस्तेमाल करता है, जो रूबल के बराबर है।
शैडो बैंकिंग का खेल
यह नेटवर्क किर्गिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात और हांगकांग जैसे देशों में मौजूद शैडो ब्रोकर्स के जरिए काम करता है। ट्रांजैक्शन पूरा करने के लिए रूबल को पहले A7A5 टोकन और फिर Tether (USDT) में बदला जाता है। हालांकि इसे 4 घंटे में सेटलमेंट का दावा किया जाता है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसमें असली कमर्शियल ट्रांजैक्शन कम और सर्कुलर ट्रेड ज्यादा है, जिससे इसकी लिक्विडिटी पर सवाल उठते हैं।
रिस्क और भारत की रणनीति
अमेरिका, यूरोपीय संघ और यूके ने इस नेटवर्क पर कड़ी नजर रखी है। Tether जैसी स्टेबलकॉइन भी प्राइवेट हैं और वे रेगुलेटरी एजेंसियों के दबाव में एसेट्स फ्रीज कर सकती हैं, जो इसे एक असुरक्षित मॉडल बनाता है।
इसके विपरीत, भारत का रुख पूरी तरह स्पष्ट है। भारत ने UPI और 'Special Rupee Vostro Accounts' जैसे पारदर्शी सिस्टम बनाए हैं। साथ ही, Bank for International Settlements (BIS) के 'Project Nexus' के जरिए भारत वैश्विक स्तर पर विश्वसनीय और रेगुलेटेड पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने पर जोर दे रहा है। A7 जैसा मॉडल शॉर्ट-टर्म में तो विकल्प दिख सकता है, लेकिन यह लंबे समय में आर्थिक अलगाव (Isolation) का कारण बन सकता है।
