भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले **95.02 से 95.06** के दायरे में कारोबार कर रहा है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड के दबाव के बीच रिजर्व बैंक (RBI) मार्केट में लगातार हस्तक्षेप कर इसे संभालने की कोशिश कर रहा है।
बुधवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले दबाव में दिखा। इस कमजोरी के पीछे मुख्य रूप से अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की अटकलें और बढ़ती अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड जिम्मेदार हैं, जिससे ग्लोबल स्तर पर डॉलर मजबूत हो रहा है।\n\n### RBI का 'सुरक्षा कवच'\nभारतीय रिजर्व बैंक (RBI) लगातार स्पॉट और स्वैप मार्केट में डॉलर बेचकर रुपए की गिरावट को थामने की कोशिश कर रहा है। इस समय भारत का फॉरेक्स रिजर्व $729 बिलियन के सर्वकालिक उच्च स्तर पर है, जो RBI को बाजार में आक्रामक हस्तक्षेप करने की ताकत देता है। यह कदम बाजार में होने वाली अचानक और बड़ी गिरावट को रोकने के लिए एक अल्पकालिक रणनीति की तरह काम कर रहा है।\n\n### कच्चे तेल की आग का असर\nरुपए पर सबसे बड़ा दबाव ग्लोबल एनर्जी मार्केट से आ रहा है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतें $90 से $92 प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में तेल आयात करता है, जिससे तेल मार्केटिंग कंपनियों की ओर से डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपए पर दबाव पड़ता है। अगर ये कीमतें और बढ़ीं, तो भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) बढ़ सकता है, जो निवेशकों की चिंता का विषय है।\n\n### अब निवेशकों की नजरें कहां हैं?\nआने वाले समय में बाजार की दिशा तय करने के लिए कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता और अमेरिका से आने वाले इकोनॉमिक डेटा बेहद महत्वपूर्ण होंगे। निवेशक इस बात पर कड़ी नजर रखेंगे कि क्या RBI अपने हस्तक्षेप की तीव्रता बढ़ाता है और क्या वैश्विक जोखिम कम होते हैं या नहीं।
