भारतीय रुपया 3 अगस्त को डॉलर के मुकाबले **24 पैसे** मजबूत होकर **95.14** के स्तर पर पहुंच गया। वैश्विक ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतों में आई तेज गिरावट ने रुपये को सहारा दिया है।
कच्चे तेल की कीमतों का असर
भारत अपनी लगभग 85% ऊर्जा जरूरतों के लिए विदेशों पर निर्भर है, ऐसे में कच्चे तेल का आयात भारत के लिए एक बड़ा खर्च है। जब तेल की कीमतें गिरती हैं, तो इन ऊर्जा आयातों के भुगतान के लिए अमेरिकी डॉलर की मांग कम हो जाती है। इससे रुपये पर दबाव कम होता है और देश के चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) में सुधार होता है। निवेशक इन कीमतों पर बारीकी से नजर रखते हैं क्योंकि यह सीधे महंगाई और सरकार के वित्तीय स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।
RBI का हस्तक्षेप और विदेशी निवेश
बाजार की स्थिरता बनाए रखने में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की भूमिका अहम है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, RBI डॉलर बेचकर रुपये की कीमत को गिरने से बचाने के लिए सक्रिय रूप से हस्तक्षेप कर रहा है।
इसके अलावा, हाल के दिनों में विदेशी पूंजी का प्रवाह भी मजबूत रहा है। हाल ही में विदेशी निवेश $40 बिलियन के पार पहुंच गया है, जिसमें एक बड़ा हिस्सा फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट बैंक (FCNR-B) डिपॉजिट रूट से आया है। यह भारतीय बैंकिंग सिस्टम के लिए विदेशी मुद्रा का एक स्थिर स्रोत प्रदान करता है।
फिलहाल रुपया रिकवरी दिखा रहा है, लेकिन बाजार विश्लेषक USD/INR की चाल पर नजर बनाए हुए हैं। आगे की दिशा ब्रेंट क्रूड की कीमतों के मौजूदा स्तर पर बने रहने या भू-राजनीतिक (Geopolitical) कारकों पर निर्भर करेगी। विदेशी निवेश की निरंतरता और RBI का रुख भी रुपये की भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।
