ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें **$100** प्रति बैरल के पार जाने से भारतीय रुपये पर भारी दबाव देखा गया है। रुपया आज डॉलर के मुकाबले **95.33** के स्तर तक लुढ़क गया है, जिससे देश का इंपोर्ट बिल बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
करेंसी मार्केट में हलचल
आज शुरुआती ट्रेड में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 25 पैसे की गिरावट के साथ 95.33 पर ट्रेड कर रहा है। करेंसी मार्केट में यह कमजोरी पूरी तरह से ग्लोबल एनर्जी मार्केट की अस्थिरता से जुड़ी है।
क्रूड ऑयल का असर
ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude) का $100 प्रति बैरल के अहम लेवल को पार करना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा चिंता का विषय है। इसका मुख्य कारण मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और 'होरमुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) के पास सप्लाई चेन को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता है। चूँकि भारत अपनी जरूरत का लगभग 88% कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर हमारे इंपोर्ट बिल पर पड़ता है। तेल खरीदने के लिए भारतीय कंपनियों को भारी मात्रा में डॉलर की जरूरत होती है, जिससे बाजार में डॉलर की डिमांड बढ़ जाती है और रुपया कमजोर होता है।
RBI का एक्शन और FIIs का रुख
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) लगातार करेंसी मार्केट की वोलेटिलिटी को कम करने की कोशिश कर रहा है। डेटा के मुताबिक, RBI अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर रुपये को सपोर्ट दे रहा है। हालांकि, बाजार में बनी हुई संरचनात्मक दबाव की स्थिति अभी भी बरकरार है। रुपये की कमजोरी से 'इंपोर्टेड इन्फ्लेशन' (Imported Inflation) का खतरा है, जिससे ईंधन और कच्चा माल महंगा हो सकता है।
वहीं, दूसरी ओर विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भी दबाव बढ़ा रहे हैं। हालिया रुझानों के अनुसार, FIIs भारतीय इक्विटी बाजार में लगातार बिकवाली कर रहे हैं। जब ये निवेशक अपना पैसा निकालकर बाहर ले जाते हैं, तो वे रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं, जिससे करेंसी पर दोहरा दबाव बनता है।
आगे क्या होगा?
निवेशकों की नजर अब क्रूड ऑयल की कीमतों पर बनी हुई है। रुपये का 95.00 के मनोवैज्ञानिक सपोर्ट लेवल को तोड़ना यह संकेत देता है कि अगर ग्लोबल सप्लाई की दिक्कतें जल्द दूर नहीं हुईं, तो गिरावट और गहरी हो सकती है। इसके अलावा, बढ़ती अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड (US Treasury Yields) भी उभरते बाजारों के लिए चुनौती बनी हुई है।
