भारतीय रुपया गुरुवार, 6 अगस्त 2026 को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 9 पैसे कमजोर होकर 95.17 पर आ गया। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट ने कुछ सहारा दिया, लेकिन जारी भू-राजनीतिक तनावों और विदेशी निवेशकों की हालिया बिकवाली का दबाव घरेलू मुद्रा पर बना रहा।
भू-राजनीतिक तनाव का असर
गुरुवार, 6 अगस्त 2026 को शुरुआती कारोबार में भारतीय रुपये पर दबाव देखा गया। रुपया 95.13 पर खुला और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले और गिरकर 95.17 पर पहुंच गया। यह गिरावट वैश्विक अनिश्चितताओं के प्रति करेंसी की संवेदनशीलता को दर्शाती है, क्योंकि मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव सकारात्मक आर्थिक संकेतों पर हावी हो रहे हैं।
कच्चे तेल की कीमतों का खेल
वैश्विक कमोडिटी मार्केट में कुछ राहत मिली, जहां ब्रेंट क्रूड की कीमतें $79.29 प्रति बैरल के निचले स्तर पर रहीं। भारत ऊर्जा का एक प्रमुख आयातक है, इसलिए तेल की कम कीमतों से देश का इंपोर्ट बिल कम होता है और अमेरिकी डॉलर की मांग घटती है, जो रुपये को सहारा देता है। हालांकि, मौजूदा भू-राजनीतिक स्थिति रुपये को इन सस्ती ऊर्जा लागतों का पूरा फायदा उठाने से रोक रही है, क्योंकि निवेशक क्षेत्रीय संघर्षों के व्यापक आर्थिक प्रभावों को लेकर सतर्क हैं।
शेयर बाजार में मजबूती
रुपये में कमजोरी के बावजूद, घरेलू शेयर बाजारों में शुरुआती कारोबार में मजबूती दिखी। BSE सेंसेक्स 201.43 अंक बढ़कर 78,782.43 पर पहुंच गया, जबकि Nifty 50 में 16.35 अंकों की बढ़त के साथ 24,641 का स्तर देखा गया। रुपये की गिरावट और शेयर सूचकांकों में बढ़ोतरी के बीच यह अंतर बताता है कि विदेशी मैक्रो-इकोनॉमिक दबावों को दर्शाने वाली करेंसी के विपरीत, घरेलू निवेशक कॉर्पोरेट आय और आर्थिक विकास को लेकर आशावादी बने हुए हैं।
FIIs की बिकवाली और RBI का रुख
बाजार सहभागियों की विदेशी फंडों के प्रवाह पर कड़ी नजर है। बुधवार, 5 अगस्त को, फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) घरेलू बाजार में नेट सेलर रहे, जिन्होंने ₹943.42 करोड़ के शेयर बेचे। इस तरह के आउटफ्लो से डॉलर की मांग बढ़ती है, जो रुपये पर और दबाव डाल सकती है। यह सब 5 अगस्त को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की हालिया मॉनेटरी पॉलिसी घोषणा के कुछ ही समय बाद हुआ, जहां केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने का फैसला किया था। दरों को स्थिर रखने का निर्णय मुद्रास्फीति को प्रबंधित करने और घरेलू विकास का समर्थन करने के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है।
निवेशकों को वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव पर नजर रखनी चाहिए, जो सीधे भारत के व्यापार संतुलन को प्रभावित करते हैं, और FII ट्रेडिंग पैटर्न पर भी ध्यान देना चाहिए, जो करेंसी की स्थिरता को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। भू-राजनीतिक तनावों में कोई भी वृद्धि या आयातकों द्वारा डॉलर की मांग में बढ़ोतरी आने वाले सत्रों में और अधिक अस्थिरता पैदा कर सकती है।
