भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले **96** के स्तर के पास कारोबार कर रहा है। क्रूड ऑयल की ऊंची कीमतें और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में उछाल ने मार्केट सेंटीमेंट को बिगाड़ दिया है। निवेशक अब नजर गड़ाए हुए हैं कि ग्लोबल फैक्टर्स और फेडरल रिजर्व के फैसलों का भारतीय अर्थव्यवस्था और आरबीआई की करेंसी रणनीति पर क्या असर पड़ेगा।
भारतीय रुपया इस समय भारी दबाव में है और 15 सितंबर, 2026 को यह डॉलर के मुकाबले 95.90 से 96.00 के दायरे में ट्रेड कर रहा है। इस गिरावट की मुख्य वजह ग्लोबल इकोनॉमी में चल रही अनिश्चितता और बढ़ती एनर्जी कॉस्ट है।
यील्ड और क्रूड का डबल अटैक
रुपए की कमजोरी के पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला, अमेरिका की 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड लगभग 5% के स्तर पर पहुंच गई है, जो 2007 के बाद का उच्चतम स्तर है। जब अमेरिकी बॉन्ड पर इतने बेहतर रिटर्न मिलते हैं, तो विदेशी निवेशक इमर्जिंग मार्केट्स जैसे भारत से पैसा निकाल कर डॉलर असेट्स में लगाने लगते हैं। वहीं दूसरी तरफ, ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $107 प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। चूंकि भारत अपनी कुल जरूरत का 85% तेल आयात करता है, इसलिए महंगे तेल का मतलब है डॉलर की डिमांड का बढ़ना, जो रुपए को और कमजोर कर रहा है।
RBI का सुरक्षा कवच मजबूत
भले ही रुपया दबाव में हो, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास विदेशी मुद्रा भंडार का एक बड़ा खजाना है। 4 सितंबर, 2026 को समाप्त हुए सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार $785 बिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह विशाल भंडार आरबीआई को बाजार में अचानक आने वाली उठा-पटक को रोकने में मदद करता है। हालांकि इसका लक्ष्य ट्रेंड को पूरी तरह बदलना नहीं है, लेकिन यह किसी भी तरह की 'डिसऑर्डरली वोलेटिलिटी' को रोकने के लिए पर्याप्त हथियार है।
महंगाई और पॉलिसी का गणित
रुपए की कमजोरी का सीधा असर देश की महंगाई पर भी पड़ता है। अगस्त में रिटेल इन्फ्लेशन (CPI) 4.82% रही थी। यदि रुपया कमजोर बना रहता है और ग्लोबल एनर्जी की कीमतें नहीं गिरतीं, तो आयातित सामान महंगे होंगे और देश में महंगाई बढ़ सकती है। अब सबकी नजरें अमेरिकी फेडरल रिजर्व पर हैं, जहां बाजार 25 बेसिस पॉइंट की ब्याज दर बढ़ोतरी की उम्मीद कर रहा है। आने वाले समय में फेड की कमेंट्री तय करेगी कि ग्लोबल यील्ड स्थिर होंगे या और बढ़ेंगे।
