US-Iran के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें **$96.60** प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। इसका सीधा असर भारतीय रुपये पर दिख रहा है, जो डॉलर के मुकाबले **94.90** के स्तर पर ट्रेड कर रहा है। महंगाई और कैपिटल आउटफ्लो के डर के बीच RBI स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
2 सितंबर, 2026 को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 94.90 के स्तर पर टिका हुआ है। यह स्थिरता तब देखी जा रही है जब वैश्विक स्तर पर तनाव चरम पर है। US और Iran के बीच बढ़ी सैन्य दुश्मनी ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से तेल आपूर्ति बाधित होने की चिंता पैदा कर दी है, जिससे ब्रेंट क्रूड $96.60 प्रति बैरल तक उछल गया है।\n\n### एनर्जी कॉस्ट का भारतीय इकोनॉमी पर असर\n\nभारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा मतलब है देश का इम्पोर्ट बिल बढ़ना। तेल कंपनियां फ्यूल इम्पोर्ट के लिए डॉलर की भारी मांग कर रही हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व का इस्तेमाल करके मार्केट में इंटरवीन कर रहा है, ताकि रुपये में अचानक आने वाली गिरावट को रोका जा सके।\n\n### ग्लोबल रिस्क और US फेडरल रिजर्व\n\nमार्केट में इस समय 'रिस्क-ऑफ' माहौल है, यानी निवेशक सुरक्षित विकल्पों की तरफ भाग रहे हैं, जिससे डॉलर ग्लोबल स्तर पर मजबूत हो रहा है। इसके अलावा, सितंबर में US फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना 67% से 70% के बीच आंकी गई है। यदि फेडरल रिजर्व लंबे समय तक ब्याज दरें ऊंची रखता है, तो भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स से विदेशी पैसा बाहर जा सकता है, जो रुपये के लिए और चुनौती बन सकता है।\n\n### आगे की राह और रिस्क\n\nइन्वेस्टर्स के लिए महंगाई सबसे बड़ा सिरदर्द बनी हुई है। यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक $96 के ऊपर बनी रहीं, तो ट्रांसपोर्टेशन और लॉजिस्टिक लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर कंज्यूमर प्राइसेस पर पड़ेगा। मिडिल ईस्ट में बढ़ते विवाद के कारण ट्रेड के लिए इंश्योरेंस और फ्रेट कॉस्ट बढ़ने का खतरा भी बना हुआ है, जो आयातकों के लिए स्थिति और कठिन बना सकता है।
