RBI की स्पेशल फॉरेन करेंसी स्वैप विंडो के जरिए आए **$136.4 बिलियन** के भारी इनफ्लो के कारण भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले दो महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। हालांकि, बाजार के जानकारों का मानना है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और डॉलर की मांग के चलते यह तेजी अस्थायी हो सकती है।
रुपये में आई मजबूती की असली वजह
भारतीय रुपया इस हफ्ते डॉलर के मुकाबले 94.28 से 94.46 के दायरे में ट्रेड करता दिखा। इस उछाल के पीछे मुख्य वजह RBI की ओर से खोली गई स्पेशल फॉरेन करेंसी स्वैप विंडो है, जिसने 31 अगस्त, 2026 तक कुल $136.4 बिलियन की लिक्विडिटी बाजार में डाली। इस भारी-भरकम राशि के पीछे मुख्य रूप से FCNR(B) डिपॉजिट और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स का बड़ा हाथ रहा है।
इस कदम का उद्देश्य वैश्विक अनिश्चितता के दौर में फॉरेक्स रिजर्व को मजबूत करना और रुपये में स्थिरता लाना था। डॉलर की बढ़ती सप्लाई ने रुपये को एशिया की बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली करेंसी में से एक बना दिया है।
आगे क्या है खतरा?
मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह राहत लंबे समय तक टिकने वाली नहीं है। स्वैप विंडो के तहत मिलने वाली यह लिक्विडिटी एक निश्चित समय सीमा के लिए थी। जैसे ही यह प्रोसेस पूरी तरह सेटल होगा, बाजार में डॉलर की कमी फिर महसूस होने लगेगी और इम्पोर्टर्स की ओर से डॉलर की डिमांड बढ़ जाएगी।
इसके अलावा, ग्लोबल मार्केट में ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतें $96 प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण तेल की कीमतें ऊपर हैं, जिसका सीधा असर भारत के इंपोर्ट बिल पर पड़ता है। भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए तेल के दाम बढ़ने से डॉलर की मांग और बढ़ेगी, जो रुपये पर दबाव डाल सकती है।
निवेशक अब रुपये के 95.50 से 96.00 के रेंज पर नजर बनाए हुए हैं। आगे की राह US फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों की पॉलिसी और क्रूड ऑयल की चाल पर निर्भर करेगी। फिलहाल, बाजार किसी भी तरह की उतार-चढ़ाव (volatility) के लिए तैयार दिख रहा है।
