RBI द्वारा करेंसी बाजार में दखल देने के बाद Indian Rupee में मजबूती आई है और यह **95.17** के स्तर पर पहुंच गया है। हालांकि, महंगाई के मोर्चे पर बुरी खबर है, जहाँ होलसेल महंगाई दर बढ़कर **11.39%** पर पहुंच गई है, जिससे बॉन्ड यील्ड में भी उछाल देखा जा रहा है।
रुपये में जान फूंकने के लिए RBI की कवायद
भारतीय रुपये ने बुधवार को डॉलर के मुकाबले 95.17 का स्तर छू लिया है, जो पिछले एक महीने का उच्चतम स्तर है। इस रिकवरी के पीछे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) का हाथ है, जिसने करेंसी मार्केट में सट्टेबाजी को रोकने और उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। सेंट्रल बैंक ने ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के लिए एक अलग डॉलर विंडो शुरू की है और करेंसी हेजिंग नियमों को और सख्त कर दिया है ताकि रुपये पर एकतरफा दबाव न पड़े।
महंगाई का डबल अटैक
रुपये को सहारा तो मिल गया, लेकिन देश की इकोनॉमी के लिए चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। सितंबर के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) आधारित महंगाई दर अगस्त के 9.92% से उछलकर 11.39% पर पहुंच गई है। इस तेजी की मुख्य वजह फ्यूल और पावर की कीमतों में हुआ 25.85% का भारी इजाफा है, जो कच्चे तेल की बढ़ती ग्लोबल कीमतों का सीधा असर है।
डेट मार्केट और कर्ज पर दबाव
बढ़ती महंगाई का सीधा असर बॉन्ड मार्केट पर दिख रहा है। बेंचमार्क 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड बढ़कर 7.41% पर पहुंच गई है। बॉन्ड यील्ड का बढ़ना इस बात का संकेत है कि सरकार और प्राइवेट कंपनियों के लिए भविष्य में कर्ज लेना महंगा हो सकता है। यदि यह थोक महंगाई रिटेल तक पहुंचती है, तो ब्याज दरों को नियंत्रित रखना RBI के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगा।
निवेशकों के लिए आगे का रास्ता
इन्वेस्टर्स अब यह देख रहे हैं कि क्या ऊंचे इंटरेस्ट रेट्स से कंपनियों के मार्जिन पर असर पड़ेगा। ज्यादा कर्ज वाली कंपनियों के ब्याज खर्च में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे उनके एक्सपेंशन प्लान्स पर ब्रेक लग सकता है। अब बाजार की नजरें ग्लोबल कच्चे तेल के भाव और अमेरिका के महंगाई डेटा पर टिकी हैं, जो USD-INR के पेयर को दिशा देंगे।
