1 अक्टूबर, 2026 को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर **95.95** के स्तर पर आ गया है। इसके पीछे मुख्य वजह अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड का **5.30%** तक पहुंचना और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं।
बाजार पर दबाव क्यों?
रुपये में आई इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड का 5.30% तक पहुंचना है, जो कि 2002 के बाद का उच्चतम स्तर है। जब अमेरिकी बॉन्ड से बेहतर रिटर्न मिलता है, तो ग्लोबल निवेशक इमर्जिंग मार्केट्स से पैसा निकालकर अमेरिकी एसेट्स की ओर रुख करते हैं।
इसके अलावा, ब्रेंट क्रूड ऑयल $107 प्रति बैरल के करीब ट्रेड कर रहा है। अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने तेल की कीमतों को आग दे दी है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में कमजोर रुपये और महंगे तेल की दोहरी मार से देश में महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
RBI का एक्शन प्लान
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इस वोलेटिलिटी को थामने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय है। सेंट्रल बैंक डॉलर की बिकवाली कर रहा है ताकि रुपये को 96.00 के मनोवैज्ञानिक स्तर को तोड़ने से बचाया जा सके। हालांकि, इस बचाव के चलते देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ा है। 18 सितंबर, 2026 को समाप्त हुए सप्ताह के आंकड़ों के अनुसार, फॉरेक्स रिजर्व में $15 बिलियन की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
निवेशकों के लिए संकेत
आयात महंगा होने से उन कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है जो कच्चे माल के लिए बाहर पर निर्भर हैं। यदि तेल की कीमतें और रुपये की कमजोरी बनी रहती है, तो महंगाई को कंट्रोल करने के लिए ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखना पड़ सकता है। अब बाजार की नजर इस पर है कि RBI और कितनी देर तक अपने रिजर्व का इस्तेमाल करके रुपये को सहारा दे पाता है।
