भारतीय रुपया पिछले एक साल में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले **9%** तक गिर गया है और अब **95.4** पर पहुँच गया है। इस गिरावट से जरूरी कच्चे माल का आयात महंगा हो रहा है और भारत का व्यापार घाटा (Trade Deficit) बढ़ रहा है, जिससे अगस्त 2026 तक खुदरा और थोक महंगाई (Inflation) पर दबाव बढ़ रहा है।
रुपया क्यों गिर रहा है?
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक मुश्किल दौर से गुज़र रही है, जहाँ करेंसी में भारी गिरावट देखी जा रही है। 3 अगस्त, 2026 तक, भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 95.4 तक कमजोर हो गया है। पिछले 12 महीनों में यह करीब 9% की गिरावट है। इस गिरावट के पीछे कई ग्लोबल कारण हैं, जैसे अमेरिकी टैरिफ का असर, पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय संघर्षों के कारण डॉलर की सुरक्षित निवेश मांग में वृद्धि, और लगातार विदेशी पोर्टफोलियो का पैसा (FPI Outflows) देश से बाहर जाना।
व्यापार और इनपुट लागत पर असर
हालांकि कमजोर करेंसी को अक्सर निर्यातकों के लिए फायदेमंद माना जाता है, लेकिन भारत की मैन्युफैक्चरिंग के लिए आयात पर निर्भरता इस कहानी को थोड़ा जटिल बना देती है। आंकड़े बताते हैं कि भारत के लगभग 36% निर्यात आयातित इनपुट पर निर्भर हैं। इसलिए, रुपये की गिरावट ने इन जरूरी कच्चे माल और मध्यवर्ती सामानों को काफी महंगा बना दिया है, जिससे कई घरेलू सेक्टरों के लिए प्रतिस्पर्धी लाभ कम हो गया है।
यह रुझान हाल के व्यापार आंकड़ों में साफ दिख रहा है। 2027 फाइनेंशियल ईयर की पहली तिमाही में भारत का मर्चेंडाइज निर्यात $129.5 बिलियन तक पहुंच गया, लेकिन आयात लागत में वृद्धि निर्यात आय से आगे निकल गई। FY27 की पहली तिमाही के लिए मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट बढ़कर $86.9 बिलियन हो गया, जो पिछले साल की समान अवधि में $68.7 बिलियन था। कमजोर रुपये और कच्चे तेल व कोयले जैसी कमोडिटी की बढ़ती कीमतों के कारण आयात मूल्य में यह उछाल आर्थिक विश्लेषकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
मैक्रोइकॉनॉमिक और महंगाई पर असर
करेंसी की गिरावट का व्यापक महंगाई दबाव पर भी असर पड़ा है। जून 2026 में खुदरा महंगाई (Retail Inflation) 18 महीने के उच्च स्तर 4.38% पर पहुँच गई, जबकि थोक मूल्य महंगाई (Wholesale Price Inflation) बढ़कर 9.9% हो गई। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि आवश्यक ऊर्जा और कच्चे माल के आयात की बढ़ी हुई लागत घरेलू अर्थव्यवस्था पर कैसे असर डाल रही है।
वित्तीय बाज़ार और अर्थशास्त्री अब भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की प्रतिक्रिया पर करीब से नज़र रख रहे हैं। लगातार महंगाई और ग्लोबल अस्थिरता को देखते हुए, केंद्रीय बैंक से ब्याज दरों को लेकर सतर्क रवैया अपनाने की उम्मीद है। व्यवसायों के लिए, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा जैसे क्षेत्रों में अधिक आयात पर निर्भर कंपनियों के लिए, आने वाली तिमाहियों में लाभ मार्जिन को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाए बिना बढ़ती इनपुट लागत का प्रबंधन करना एक महत्वपूर्ण कारक होगा।
