ग्लोबल टेंशन और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के चलते रुपया बुधवार को **2 पैसे** टूटकर **94.97** के स्तर पर आ गया है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर घरेलू बाजार पर भी दिख रहा है।
बुधवार के कारोबारी सत्र में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 94.97 के स्तर पर आ गया। ग्लोबल अनिश्चितता के कारण रुपये में 2 पैसे की गिरावट दर्ज की गई है। निवेशक मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और अमेरिका में सरकारी बॉन्ड यील्ड में आए उछाल को लेकर काफी सतर्क हैं।
जियोपॉलिटिकल रिस्क और एनर्जी का दबाव
बाजार में घबराहट की मुख्य वजह अमेरिका और ईरान के बीच फिर से बढ़ रहे तनाव हैं, जिससे हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में सप्लाई बाधित होने का डर है। भारत एक बड़ा एनर्जी आयातक देश है, इसलिए क्रूड ऑयल की कीमतों का सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) के दाम $96 प्रति बैरल के करीब पहुंच गए हैं, जिससे भारत के ट्रेड बैलेंस पर दबाव बढ़ गया है। तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ती है, जो रुपये को नीचे धकेल रही है।
US ट्रेजरी यील्ड का असर
जियोपॉलिटिकल फैक्टर्स के अलावा अमेरिकी डॉलर की मजबूती भी रुपये के लिए चुनौती बनी हुई है। अमेरिका की 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड (US 10-year Treasury yield) बढ़कर 4.8% के पार निकल गई है, जो कि जनवरी 2025 के बाद का उच्चतम स्तर है। जब अमेरिकी बॉन्ड्स पर बेहतर रिटर्न मिलता है, तो विदेशी निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालकर डॉलर एसेट्स में निवेश करने लगते हैं।
घरेलू मार्केट का हाल
सेंसेक्स (Sensex) और निफ्टी (Nifty) जैसे घरेलू इंडेक्स भी इस सुस्ती से अछूते नहीं रहे। निवेशकों में रिस्क-एवर्स (risk-averse) सेंटिमेंट देखने को मिला, क्योंकि एनर्जी की बढ़ती कीमतें और ग्लोबल अस्थिरता कॉर्पोरेट मार्जिन्स पर असर डाल सकती हैं।
आने वाले कुछ दिन करेंसी मार्केट के लिए काफी महत्वपूर्ण रहेंगे। ट्रेडर्स अब अमेरिकी आर्थिक डेटा जैसे कि नॉन-फार्म पेरोल्स (non-farm payrolls) पर नजर गड़ाए हुए हैं। यदि ये इंडिकेटर्स थोड़े नरम पड़ते हैं, तो बॉन्ड मार्केट को कुछ राहत मिल सकती है, अन्यथा मिडिल ईस्ट का तनाव रुपये पर दबाव बनाए रखेगा।
