बुधवार को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर **95.97** के स्तर पर पहुंच गया है, जो **96.00** के मनोवैज्ञानिक स्तर के काफी करीब है। विदेशी निवेशकों (FIIs) की ताबड़तोड़ बिकवाली और तेल कंपनियों की डॉलर डिमांड के चलते भारतीय करेंसी पर भारी दबाव बना हुआ है।
भारतीय रुपये में लगातार कमजोरी देखी जा रही है। इसका मुख्य कारण घरेलू बाजार में डॉलर की बढ़ती मांग है, जिसे तेल मार्केटिंग कंपनियां अपने पेमेंट के लिए खरीद रही हैं। ऊर्जा आयातकों की ओर से डॉलर की यह निरंतर मांग रुपये को नीचे खींच रही है।
विदेशी फंड का आउटफ्लो और तेल का असर
रुपये में कमजोरी के पीछे ग्लोबल एनर्जी प्राइसेज और घरेलू बाजार से पैसा निकलने का दोहरा असर है। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय बाजारों से पैसा निकालना शुरू कर दिया है। केवल मंगलवार को ही इन निवेशकों ने ₹9,980.22 करोड़ के शेयर नेट-सेल किए हैं। जब FIIs अपना निवेश बेचकर उसे डॉलर में बदलते हैं, तो बाजार में रुपये की सप्लाई बढ़ जाती है और उसकी वैल्यू गिरती है। वहीं दूसरी ओर, Brent Crude Oil की कीमतें $103.43 प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं, जिससे भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ रहा है।
RBI का एक्शन और फॉरेक्स रिजर्व
रुपये की गिरावट को थामने के लिए Reserve Bank of India लगातार एक्टिव है। केंद्रीय बैंक सरकारी बैंकों के जरिए बाजार में डॉलर की बिकवाली कर रहा है ताकि उतार-चढ़ाव को मैनेज किया जा सके। ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) $14.9 अरब घटकर $766 अरब रह गया है, जो रुपये को बचाने के लिए RBI के कड़े संघर्ष को दर्शाता है। फिलहाल U.S. Dollar Index 101.40 पर मजबूत बना हुआ है।
निवेशकों के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि विदेशी फंड फ्लो की दिशा क्या रहती है और कच्चे तेल की कीमतें क्या रुख अपनाती हैं। जब तक ये दो बड़े फैक्टर रुपये पर भारी रहेंगे, करेंसी में अस्थिरता बनी रह सकती है।
