भारतीय रुपया आज **11 पैसे** फिसलकर **95.84** के स्तर पर पहुंच गया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और ग्लोबल अनिश्चितता ने सेंसेक्स और निफ्टी पर दबाव बनाया है, जिससे निवेशक अब कंपनियों के मुनाफे पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंतित हैं।
भारतीय रुपया गुरुवार को दबाव में दिखा और डॉलर के मुकाबले 95.84 पर खुला। यह 11 पैसे की गिरावट सीधे तौर पर वेस्ट एशिया में चल रहे तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का नतीजा है। ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स अभी $102.08 प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा है, जो भारत जैसे ऊर्जा आयातक देश के लिए चिंता का बड़ा विषय है। तेल महंगा होने से डॉलर की डिमांड बढ़ती है, जिससे रुपए में कमजोरी आती है।
मार्केट और सेंटीमेंट पर असर
रुपए की सुस्ती का असर घरेलू शेयर बाजार पर भी दिखा। बीएसई सेंसेक्स 506.43 अंक गिरकर 74,321.82 पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 181 अंक फिसलकर 23,266.15 पर आ गया। गौर करने वाली बात यह है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने बुधवार को ₹1,617.45 करोड़ की खरीदारी की थी, लेकिन ग्लोबल हेडविंड्स के कारण बाजार में सावधानी का माहौल है।
डॉलर इंडेक्स और बॉन्ड यील्ड का खेल
यूएस डॉलर इंडेक्स बढ़कर 100.87 हो गया है, जिसे अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी से सपोर्ट मिल रहा है। जब अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो ग्लोबल निवेशक इमर्जिंग मार्केट्स से पैसा निकालकर अमेरिकी एसेट्स में लगाना पसंद करते हैं, जिससे रुपए पर दोहरा दबाव पड़ता है।
कॉरपोरेट मुनाफे पर खतरा
रुपए के कमजोर होने से इंपोर्ट महंगा हो जाता है। ऑटोमोबाइल, एफएमसीजी और ऑइल मार्केटिंग कंपनियों के लिए रॉ मटेरियल का खर्च बढ़ सकता है। अगर कंपनियां यह लागत ग्राहकों पर नहीं डाल पाईं, तो आने वाली तिमाहियों में उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव दिख सकता है। वहीं, आईटी और फार्मा सेक्टर को करेंसी के उतार-चढ़ाव से कुछ राहत मिल सकती है। अब निवेशकों की नजरें आरबीआई के कदम और ग्लोबल ऑइल प्राइस की दिशा पर टिकी हैं।
