सड़क परिवहन मंत्रालय ने राज्यों से नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट्स पर स्टैंप ड्यूटी खत्म करने को कहा है। सरकार का मकसद कॉन्ट्रैक्ट्स को सरल बनाना है, लेकिन कई राज्यों के विरोध के कारण निवेशकों के लिए अनिश्चितता बढ़ गई है।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने पूरे भारत में नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट्स के लिए स्टैंप ड्यूटी नियमों को एकसमान बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। केंद्र सरकार का तर्क है कि इन लेवी (levee) से बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्ट्रैक्ट्स में अनावश्यक कागजी कार्रवाई और खर्च बढ़ता है, जिसे कम करना बेहद जरूरी है।
क्या है विवाद की जड़?
वर्तमान में, NHAI और प्राइवेट डेवलपर्स के बीच समझौतों पर राज्य-स्तरीय ड्यूटी का पेंच फंसा हुआ है। जहां कई समझौतों में ₹100 का मामूली स्टैंप पेपर इस्तेमाल होता है, वहीं कुछ राज्य कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू का 0.25% से लेकर 3% तक टैक्स वसूलते हैं। केंद्र सरकार इसे डेवलपर्स की फाइनेंशियल प्लानिंग में बड़ी बाधा मानती है।
खासकर, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा जैसे राज्य इस छूट का विरोध कर रहे हैं। मामला तब और गंभीर हो गया जब उत्तर प्रदेश सरकार ने टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर (TOT) प्रोजेक्ट्स पर 12% की लेवी मांग ली, इसे लीज एग्रीमेंट के तौर पर वर्गीकृत किया।
निवेशकों के लिए जोखिम
प्राइवेट डेवलपर्स जब हाईवे प्रोजेक्ट्स के लिए बोली लगाते हैं, तो वे अपनी रिटर्न कैलकुलेशन फिक्स्ड कॉस्ट के आधार पर करते हैं। यदि राज्य सरकारें बीच में टैक्स नियमों की व्याख्या बदलती हैं, तो यह प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ा देता है। इस अनिश्चितता के कारण डेवलपर्स के लिए लॉन्ग-टर्म प्रॉफिट मार्जिन का अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है।
सरकार की एसेट मोनेटाइजेशन रणनीति की सफलता एक स्थिर रेगुलेटरी वातावरण पर टिकी है। यदि निवेशक यह महसूस करेंगे कि प्रोजेक्ट्स कानूनी विवादों में फंसे रहेंगे, तो भविष्य में बिडिंग प्रोसेस में उनकी भागीदारी कम हो सकती है। अब बाजार की नजरें केंद्र और राज्यों के बीच होने वाली बातचीत पर टिकी हैं, क्योंकि इसका सीधा असर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की रफ्तार पर पड़ेगा।
