भारत की सड़कों पर जमी धूल शहरी प्रदूषण का बड़ा कारण बन गई है, जिससे National Clean Air Programme (NCAP) के तहत खर्च किए गए **₹16,500 करोड़** का असर कम होता दिख रहा है। अब इंफ्रास्ट्रक्चर और स्मार्ट मॉनिटरिंग में बदलाव की जरूरत बढ़ गई है।
भारत के बड़े शहरों में सड़कों पर जमी धूल न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि यह सरकारी खजाने के सही इस्तेमाल पर भी सवाल खड़े कर रही है। 2019 से अब तक NCAP के तहत ₹16,500 करोड़ खर्च करने के बावजूद, सड़क की रेत और धूल प्रदूषण का मुख्य जरिया बनी हुई है। निवेशकों के लिए अब पुराने ढर्रे के मेंटेनेंस और नई तकनीक के बीच का अंतर साफ दिख रहा है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की खामियां
विशेषज्ञों के मुताबिक, सड़कों के किनारे पक्की पेविंग का न होना धूल का बड़ा कारण है। गाड़ियां गुजरते ही किनारे की मिट्टी हवा में उड़ने लगती है, जिसे साधारण झाड़ू से साफ करना नामुमकिन है। ग्लोबल स्टैंडर्ड के हिसाब से धूल का स्तर 2 ग्राम प्रति वर्ग मीटर से कम होना चाहिए, जबकि भारत के कई इलाकों में यह स्तर 10 गुना तक ज्यादा है। भविष्य में टेंडर्स में पक्की सड़कों और मजबूत किनारों की शर्तें और सख्त होने की उम्मीद है।
बदलती मेंटेनेंस जरूरतें
मौजूदा मैन्युअल या साधारण मैकेनिकल सफाई अक्सर बारीक धूल को हवा में फिर से उड़ा देती है, जो ज्यादा खतरनाक है। अब बाजार में GPS-ट्रैक्ड और हाई-एफिशिएंसी वैक्यूम स्वीपर्स की मांग बढ़ रही है। उन कंपनियों को फायदा हो सकता है जो हार्डवेयर के साथ-साथ रियल-टाइम डेटा और एयर क्वालिटी की मॉनिटरिंग करने की सुविधा दे सकती हैं।
आर्थिक और रेगुलेटरी असर
नियामक संस्थाएं अब कंस्ट्रक्शन साइट्स पर रियल-टाइम मॉनिटरिंग पर जोर दे रही हैं। जो कंपनियां धूल को रोकने के आधुनिक प्रोटोकॉल का पालन करेंगी, उनके लिए प्रोजेक्ट रुकने या कानूनी अड़चनों का खतरा कम होगा। आगे चलकर यह देखना दिलचस्प होगा कि म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन अपने बजट को साधारण सफाई के बजाय टेक्नोलॉजी-ड्रिवेन इंफ्रास्ट्रक्चर पर कितना खर्च करती हैं, क्योंकि यही निवेश की असली दिशा तय करेगा।
