US 10-year Treasury yields में बढ़ोतरी ने भारतीय बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। यील्ड का गैप **14-महीने** के निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों के बजाय अमेरिकी सुरक्षित डेट (Debt) की तरफ रुख कर रहे हैं, जिसका सीधा असर BSE Sensex की वैल्युएशन पर दिख रहा है।
बॉन्ड यील्ड क्यों बनी बड़ी मुसीबत?
ग्लोबल निवेशक हमेशा इस बात का हिसाब रखते हैं कि उन्हें रिस्की इक्विटी (Stocks) में निवेश करने पर कितना एक्स्ट्रा रिटर्न मिल रहा है, जिसे 'रिस्क प्रीमियम' कहा जाता है। चूंकि US Treasury बॉन्ड में पैसा सुरक्षित माना जाता है, इसलिए जब वहां यील्ड 5% के करीब पहुंचती है, तो निवेशकों को भारतीय कंपनियों से और बेहतर ग्रोथ की उम्मीद होती है। मौजूदा हालात में यह 'यील्ड गैप' काफी सिमट गया है, जिससे ग्लोबल फंड्स का ध्यान भारतीय बाजार से हटकर अमेरिकी एसेट्स की ओर शिफ्ट हो रहा है।
FPI की बिकवाली का असर
इस शिफ्ट का असर Foreign Portfolio Investors (FPI) की लगातार हो रही बिकवाली के रूप में सामने आ रहा है। जब FPI भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं, तो इसका सबसे ज्यादा दबाव उन लार्ज-कैप स्टॉक्स पर पड़ता है जो BSE Sensex का हिस्सा हैं। बाजार अब उन ऊंचे दामों को चुकाने से कतरा रहा है जिन पर भारतीय कंपनियां ट्रेड कर रही हैं।
वैल्युएशन और रुपये की चाल
जब अमेरिका में ब्याज दरें (Interest Rates) ऊंची रहती हैं, तो इसका असर सीधे हमारे P/E मल्टीपल पर पड़ता है। निवेशक अब शेयरों के लिए ऊंची कीमत देने के बजाय 'अर्निंग यील्ड' की मांग कर रहे हैं। साथ ही, मजबूत डॉलर और कमजोर भारतीय रुपये का तालमेल भी स्थिति को बिगाड़ रहा है। रुपया कमजोर होने से विदेशी निवेशकों की होल्डिंग की वैल्यू घट जाती है, जो मार्केट सेंटीमेंट को और कमजोर करता है। अब बाजार की नजरें US Federal Reserve की अगली कमेंट्री और महंगाई के आंकड़ों पर टिकी हैं, जो आगे की दिशा तय करेंगे।
