Fuel Subsidy Crisis: वैश्विक सरकारों की बढ़ी टेंशन, फिसल सकता है सरकारी खजाना

ECONOMY
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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Fuel Subsidy Crisis: वैश्विक सरकारों की बढ़ी टेंशन, फिसल सकता है सरकारी खजाना

दुनियाभर की सरकारें इस समय फ्यूल सब्सिडी (Fuel Subsidy) के बोझ तले दबी हुई हैं। बढ़ती कीमतों और महंगे कर्ज के बीच सरकारों के लिए फिस्कल बैलेंस बनाना चुनौती बन गया है, जिससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं में अनिश्चितता का माहौल है।

दुनियाभर की सरकारें एक कठिन दौर से गुजर रही हैं। एक तरफ एनर्जी की ऊंची कीमतें हैं, तो दूसरी तरफ कर्ज लेने की बढ़ती लागत। ऐसे में फिस्कल हेल्थ को बनाए रखना और सोशल अनरेस्ट (Social Unrest) को रोकना नीति निर्माताओं के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।

फिस्कल स्टेबिलिटी पर बड़ा असर

इतिहास गवाह है कि एनर्जी सब्सिडी ने हमेशा ग्लोबल ऑयल मार्केट की अस्थिरता से जनता को बचाया है। लेकिन आज के High Interest Rate के दौर में इन सब्सिडीज को फंड करना सरकार के बजट को बिगाड़ रहा है। जब सेंट्रल बैंक महंगाई को काबू करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाते हैं, तो सरकारी घाटे को पूरा करने के लिए उधार लेना और महंगा हो जाता है।

उभरती अर्थव्यवस्थाओं (Emerging Economies) के लिए सब्सिडी का रास्ता अब छोटा होता जा रहा है। अगर सरकारें अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा सब्सिडी में खर्च कर देंगी, तो इंफ्रास्ट्रक्चर और सोशल सेक्टर के लिए पैसा कम पड़ जाएगा। वहीं, अगर सब्सिडी हटाई गई, तो जनता का गुस्सा फूट सकता है।

निवेशकों की नजर में क्या है?

इन्वेस्टर्स अब इन स्थितियों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं क्योंकि इसका सीधा असर 'सॉवरेन क्रेडिट प्रोफाइल' पर पड़ता है। Debt-to-GDP Ratio के बढ़ने से सरकारी बॉन्ड पर रिस्क प्रीमियम बढ़ जाता है। बाजार अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए है कि सरकारें 'ब्लैंकेट सब्सिडी' से हटकर 'टारगेटेड सब्सिडी' की ओर कब बढ़ेंगी, ताकि सिर्फ जरूरतमंदों को ही लाभ मिले और राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) काबू में रहे।

भविष्य में, सुधारों की गति और आईएमएफ (IMF) या वर्ल्ड बैंक (World Bank) जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के रुख पर निवेशकों की नजरें टिकी रहेंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.