इंडियन ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के सामने मुश्किलें बढ़ गई हैं। कच्चे तेल की कीमत **$118** प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई है और रूस से मिलने वाले डिस्काउंट में भारी कमी आई है, जिससे रिटेल फ्यूल कारोबार पर दबाव साफ़ दिख रहा है।
भारतीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के लिए मौजूदा दौर चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। रूसी कच्चे तेल (Russian Urals) पर मिलने वाला डिस्काउंट जो पहले $14 प्रति बैरल था, वह अब घटकर मात्र $2 रह गया है। वहीं, इंडियन क्रूड बास्केट की कीमत $118 प्रति बैरल के करीब मंडरा रही है, जिससे IOCL, BPCL और HPCL जैसे प्रमुख रिटेलर्स के मुनाफे पर गहरी चोट पड़ रही है।
रिटेल फ्यूल बिजनेस में भारी नुकसान
मौजूदा प्राइसिंग मॉडल के हिसाब से, कंपनियों को पेट्रोल पर लगभग ₹25 और डीजल पर ₹37 प्रति लीटर तक का नुकसान उठाना पड़ सकता है। जब तक कंपनियां इस बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर नहीं डालतीं, तब तक उनके मार्केटिंग मार्जिन का दबाव बना रहेगा।
बढ़ता लॉजिस्टिक खर्च
सिर्फ कच्चा तेल ही नहीं, लॉजिस्टिक लागत भी कंपनियों की कमर तोड़ रही है। फ्रेट रेट्स अभी भी संकट से पहले के मुकाबले करीब 8 गुना ज्यादा हैं। कुल लैंडेड कॉस्ट में फ्रेट चार्जेस का हिस्सा जो पहले 3% के आसपास हुआ करता था, अब बढ़कर 25% हो गया है।
पेट्रोकेमिकल सेगमेंट बना सहारा
इस बीच, Reliance Industries जैसी इंटीग्रेटेड कंपनियों को राहत मिल रही है। रिफाइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में आई दिक्कतों के चलते पॉलीइथाइलीन और पॉलीप्रोपाइलीन जैसे प्रोडक्ट्स के मार्जिन में 55% तक का उछाल आया है। यह पेट्रोकेमिकल स्ट्रेंथ फ्यूल रिटेल सेगमेंट की कमजोरी को काफी हद तक बैलेंस कर रही है। निवेशकों को आने वाले समय में क्रूड बास्केट के भाव और कंपनियों के मार्जिन बनाए रखने की क्षमता पर खास नज़र रखनी होगी।
