ग्लोबल मार्केट से मिले खराब संकेतों का असर घरेलू शेयर बाजार पर दिख रहा है। US Treasury Yields के **4.8%** पर पहुंचने और Brent Crude के **$96** के करीब ट्रेड करने से भारतीय बाजारों पर दबाव है। हालांकि, DIIs की दमदार खरीदारी बाजार को सपोर्ट दे रही है, लेकिन FIIs की लगातार बिकवाली चिंता का विषय बनी हुई है।
भारतीय शेयर बाजार फिलहाल एक कठिन दौर से गुजर रहा है। अमेरिका में 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड 4.8% के स्तर को छू चुकी है, जबकि भारत में भी 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड 7% के आंकड़े की ओर बढ़ रही है। इन बढ़ती यील्ड्स के कारण इक्विटी मार्केट का आकर्षण कम हो रहा है क्योंकि अब सुरक्षित सरकारी बॉन्ड में भी बेहतर रिटर्न मिल रहा है।
बॉन्ड यील्ड और वैल्युएशन पर असर
जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो कंपनियों के भविष्य के मुनाफे का 'डिस्काउंट रेट' भी बढ़ जाता है, जिससे शेयरों के वैल्युएशन पर दबाव आता है। हाई-ग्रोथ और कर्ज में डूबी कंपनियों के लिए यह स्थिति सबसे चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि ब्याज दरें बढ़ने से उनकी उधारी की लागत बढ़ जाती है, जिसका सीधा असर उनके प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ने की आशंका है।
कच्चे तेल की कीमतों का महंगाई कनेक्शन
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतें $95 से $96 प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी आयात पर निर्भर है, के लिए यह महंगाई का एक बड़ा कारण है। ऊंची महंगाई दर के कारण Reserve Bank of India (RBI) के लिए ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो रहा है, जो बाजार के लिए एक नेगेटिव फैक्टर है।
FIIs vs DIIs की जंग
बाजार को फिलहाल घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) का भरपूर सहारा मिल रहा है। विदेशी निवेशक (FIIs) लगातार बिकवाली कर रहे हैं, लेकिन म्यूचुअल फंड और बीमा कंपनियों जैसे DIIs ने इस बिकवाली को काफी हद तक सोख लिया है। निफ्टी और सेंसेक्स की मजबूती अब इस बात पर टिकी है कि क्या घरेलू निवेशक आगे भी इस दबाव को झेल पाएंगे। निवेशकों को अब RBI के फैसलों और कंपनियों के अगले नतीजों में इनपुट कॉस्ट के प्रबंधन पर नजर रखनी चाहिए।
