क्या हुआ?
भारत में नए डिमैट अकाउंट खुलने की रफ़्तार लगातार तीसरे महीने धीमी पड़ गई है। मई 2026 में करीब 23 लाख नए डिमैट अकाउंट खुले, जो 2025 के मासिक औसत 25 लाख से कम है। यह रिटेल निवेशकों को जोड़ने की गति में एक बदलाव का संकेत है। हालांकि, भारत में कुल डिमैट खातों की संख्या 20 करोड़ के पार हो गई है, लेकिन नए रजिस्ट्रेशन की दर में कमी आई है।
इनएक्टिविटी की हकीकत
निवेशकों के लिए यह समझना ज़रूरी है कि कुल रजिस्टर्ड खातों की भारी संख्या और असल मार्केट पार्टिसिपेशन में अंतर है। डेटा बताता है कि डिमैट खातों की तेजी से बढ़ती संख्या का एक बड़ा हिस्सा इनएक्टिव (inactive) है। इंडस्ट्री के विश्लेषण के अनुसार, पिछले एक साल में कुल खातों में से केवल 23% खातों में ही कम से कम एक ट्रांजैक्शन (transaction) हुआ है।
कई अकाउंट हालिया बुल मार्केट (bull market) के चरम पर खोले गए थे, अक्सर इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) में भाग लेने की चाहत में। जब शुरुआती उत्साह कम हो जाता है या लिस्टिंग पर मुनाफा कमाना मुश्किल हो जाता है, तो ये अकाउंट अक्सर निष्क्रिय हो जाते हैं। इससे एक ऐसी स्थिति बनती है जहाँ 'कुल खातों' की संख्या रिकॉर्ड उच्च स्तर पर बनी रहती है, जबकि असल एक्टिव ट्रेडर्स (traders) और लॉन्ग-टर्म निवेशकों की संख्या कहीं ज़्यादा धीमी और संतुलित गति से बढ़ती है।
ब्रोकरेज सेक्टर पर रेगुलेटरी दबाव
खातों की संख्या में यह धीमी रफ्तार ऐसे समय में आई है जब ब्रोकरेज फर्म रेगुलेटर्स (regulators) की तरफ से अतिरिक्त दबाव का सामना कर रही हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग एक्टिविटीज़ (proprietary trading activities) और कैपिटल मार्केट इंटरमीडियरीज (capital market intermediaries) के लिए सख्त लेंडिंग नॉर्म्स (lending norms) को लेकर हालिया अपडेट्स ने इस सेक्टर में चिंता पैदा कर दी है।
इन नए नियमों के तहत, ज़्यादा कोलैटरल (collateral) की ज़रूरत और ब्रोकर की प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग के लिए बैंक फंडिंग की सीमा तय करने से ब्रोकरेज और एक्सचेंज से जुड़े शेयरों में अस्थिरता आई है। चूँकि ब्रोकरेज फर्म्स रेवेन्यू (revenue) बनाए रखने के लिए लगातार ट्रेडिंग वॉल्यूम (trading volumes) और नए अकाउंट ग्रोथ पर निर्भर करती हैं, इसलिए नए यूज़र एडिशन (user additions) में कमी और सख्त रेगुलेटरी ज़रूरतों का संयुक्त प्रभाव बाज़ार द्वारा बारीकी से देखा जा रहा है।
रिटेल सेंटीमेंट सतर्क क्यों है?
पिछले कुछ महीनों में रिटेल सेंटीमेंट (sentiment) के ठंडे पड़ने के कई कारण हैं:
- मार्केट वोलैटिलिटी (Market Volatility): सालों की मज़बूत, एकतरफ़ा तेज़ी के बाद, हालिया मार्केट करेक्शन (corrections) और ज़्यादा उतार-चढ़ाव ने नए, कम अनुभवी निवेशकों को अधिक सतर्क बना दिया है।
- अर्निंग्स और मैक्रो कंसर्न्स (Earnings and Macro Concerns): कॉर्पोरेट अर्निंग्स ग्रोथ (corporate earnings growth) को लेकर चिंताएं, भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं (geopolitical uncertainties) और इन्फ्लेशन (inflation) के साथ मिलकर, निवेशक के भरोसे को दबा रही हैं।
- टॉप शहरों में सैचुरेशन (Saturation in Top Cities): बड़े शहरी केंद्रों में आर्थिक रूप से सक्रिय व्यक्तियों का एक बड़ा हिस्सा पहले से ही डिमैट अकाउंट रखता है। आगे की ग्रोथ अब छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में विस्तार पर निर्भर करती है, जिसमें अधिक समय और शिक्षा की आवश्यकता होती है।
निवेशक क्या नज़र रखें?
बाज़ार के व्यापक स्वास्थ्य को देखने वाले निवेशकों को 'नए अकाउंट एडिशन' के अलावा कुछ महत्वपूर्ण मेट्रिक्स (metrics) पर नज़र रखनी चाहिए:
- एक्टिव इन्वेस्टर बेस (Active Investor Base): केवल कुल रजिस्टर्ड डिमैट खातों की संख्या के बजाय, 'एक्टिव' निवेशकों की संख्या पर नज़र रखें - यानी वो जो नियमित रूप से ट्रेड करते हैं या पोर्टफोलियो रखते हैं।
- SIP इनफ्लो (SIP Inflows): सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) का योगदान रिटेल कमिटमेंट (commitment) का एक महत्वपूर्ण संकेतक बना हुआ है। भले ही नए डिमैट खातों का खुलना धीमा हो जाए, लगातार SIP इनफ्लो दिखाते हैं कि मौजूदा निवेशक लॉन्ग-टर्म (long-term) के लिए बने हुए हैं।
- ब्रोकरेज हेल्थ (Brokerage Health): आने वाली तिमाहियों में ब्रोकरेज बिज़नेस मॉडल्स (business models) पर नए रेगुलेटरी नॉर्म्स (norms) के प्रभाव पर नज़र रखें, खासकर यह कि वे फंडिंग और कोलैटरल ज़रूरतों का प्रबंधन कैसे करते हैं।
- कॉर्पोरेट अर्निंग्स (Corporate Earnings): जैसे-जैसे रिटेल निवेशक हाई-मार्जिन (high-margin), फंडामेंटली मज़बूत कंपनियों पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं, इन विशिष्ट शेयरों का प्रदर्शन व्यापक मार्केट इंडाइसेस (indices) की तुलना में सेंटीमेंट को ज़्यादा प्रभावित करने की संभावना है।
