सितंबर 2026 इतिहास का दूसरा सबसे गर्म महीना दर्ज किया गया है, जिसकी मुख्य वजह तीव्र होता एल नीनो (El Niño) है। भारतीय निवेशकों के लिए यह एक बड़ी चिंता का विषय है क्योंकि इसका सीधा असर कृषि उपज, फूड इन्फ्लेशन और ऊर्जा सप्लाई पर पड़ सकता है।
जलवायु परिवर्तन और बढ़ता तापमान
ग्लोबल क्लाइमेट मॉनिटरिंग एजेंसियों ने पुष्टि की है कि सितंबर 2026 का महीना अब तक का दूसरा सबसे गर्म सितंबर रहा है। सतह का औसत तापमान 16.27°C दर्ज किया गया, जो प्री-इंडस्ट्रियल लेवल से 1.63°C अधिक है। प्रशांत महासागर के 'नीनो 3.4' (Niño 3.4) क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान रिकॉर्ड 29.70°C तक पहुंच गया है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह वार्मिंग साइकिल 2027 की शुरुआत तक जारी रह सकती है।
भारतीय कृषि और इन्फ्लेशन पर असर
एल नीनो का सीधा असर मानसून पर पड़ता है, जिससे बारिश अनियमित हो सकती है। अनियमित बारिश का मतलब है फसलों का चक्र बिगड़ना और पैदावार में कमी। यदि चावल, गेहूं और चीनी जैसे जरूरी कमोडिटीज़ की सप्लाई प्रभावित होती है, तो फूड इन्फ्लेशन बढ़ेगी। इसका सीधा असर FMCG और फूड-प्रोसेसिंग कंपनियों के नेट प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ेगा, क्योंकि रॉ मटेरियल महंगा होने से लागत बढ़ जाती है।
ऊर्जा और ऑपरेशनल रिस्क
तेज गर्मी के कारण बिजली ग्रिड पर कूलिंग डिमांड का भारी दबाव बढ़ रहा है। एल नीनो की वजह से होने वाली पानी की कमी थर्मल पावर प्लांट्स के कूलिंग सिस्टम और कोयले की ढुलाई (Inland Waterways) को प्रभावित कर सकती है। साथ ही, जलाशयों में पानी का स्तर घटने से हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर की उत्पादन क्षमता भी कम हो सकती है, जिससे महंगी बिजली पर निर्भरता बढ़ेगी।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आने वाली तिमाही के नतीजों में कंपनियों के मैनेजमेंट कमेंट्री पर नजर रखें। विशेषकर कंज्यूमर गुड्स, एग्री और पावर सेक्टर की कंपनियां अपने रॉ मटेरियल की सोर्सिंग और कॉस्ट इन्फ्लेशन को कैसे मैनेज कर रही हैं, यह जानना जरूरी है। इसके अलावा, मानसून की स्थिति पर मौसम विभाग के अपडेट्स निवेशकों के लिए एक 'की-वेरिएबल' (Key Variable) साबित होंगे।
