भारत का विदेशी मुद्रा भंडार **$716.91 बिलियन** के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। RBI ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए गोल्ड और फॉरवर्ड करेंसी कॉन्ट्रैक्ट्स पर फोकस बढ़ाया है, ताकि रुपये की चाल को बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सके।
भारत का फॉरेक्स रिजर्व $716.91 बिलियन के ऑल-टाइम हाई पर पहुंच चुका है। RBI अब केवल डॉलर का भंडार नहीं बना रहा, बल्कि अपनी संपत्ति के बास्केट को गोल्ड और जटिल फाइनेंशियल कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए डायवर्सिफाई कर रहा है।
सोने पर बढ़ रहा भरोसा
RBI की नई रणनीति में सोना यानी गोल्ड केंद्र में है। अब कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी करीब 17% है। केंद्रीय बैंक न सिर्फ सोना खरीद रहा है, बल्कि उसे देश के भीतर सुरक्षित भी कर रहा है। 2026 फाइनेंशियल ईयर में 100 मीट्रिक टन से ज्यादा सोना विदेश से वापस भारत लाया गया है। अप्रैल 2026 तक, भारत का 77% गोल्ड स्टॉक घरेलू तिजोरियों में सुरक्षित हो चुका है, जो जियो-पॉलिटिकल जोखिमों को कम करने की दिशा में बड़ा कदम है।
फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स से रुपये को सुरक्षा
RBI अब स्पॉट मार्केट में सीधे डॉलर बेचने के बजाय फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स का स्मार्ट इस्तेमाल कर रहा है। इससे रिजर्व पर सीधा दबाव नहीं पड़ता और मार्केट को रुपये की दिशा के संकेत मिल जाते हैं। अगस्त 2026 तक, बैंक ने स्पेशल फॉरेक्स स्वैप फैसिलिटी और NRI डिपॉजिट्स के जरिए करीब $73 बिलियन जुटाए हैं, जिससे कैश फ्लो को स्टेबल रखा जा सके।
'असली' लिक्विडिटी का गणित
हालांकि $716.91 बिलियन की हेडलाइन फिगर प्रभावशाली है, लेकिन एनालिस्ट्स का मानना है कि फॉरवर्ड लायबिलिटीज को घटाकर ही 'असली' लिक्विडिटी का पता चलता है। इन डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के कारण भविष्य में डॉलर की देनदारियां भी खड़ी हैं, इसलिए बाजार के जानकार अब इसे 'डुअल-मेट्रिक' नजरिए से देख रहे हैं।
आगे क्या है रिस्क?
निवेशकों की नजर अब क्रूड ऑयल की कीमतों पर है। भारत के भारी ऑयल इंपोर्ट के कारण बैलेंस ऑफ पेमेंट पर दबाव बना रहता है। अगर तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ेगी, जो RBI की मौजूदा रणनीति की असली परीक्षा होगी। इसके अलावा, गोल्ड की ग्लोबल कीमतों में उतार-चढ़ाव भी रिजर्व की वैल्यू पर असर डाल सकता है।
