RBI Policy: महंगाई का 'तूफान' और बॉन्ड यील्ड का 'दबाव', क्या रेट कट पर लगेगी रोक?
Overview
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) फिलहाल ब्याज दरों को स्थिर रखने यानी 'पॉज' पर बना हुआ है। लेकिन, दुनिया भर में बढ़ती महंगाई, खासकर तेल की कीमतों में उछाल और बॉन्ड यील्ड पर लगातार बढ़ते दबाव के चलते RBI की मॉनेटरी पॉलिसी को लेकर मुश्किलें खड़ी हो गई हैं।
RBI के सामने बड़ा संकट: महंगाई या बॉन्ड यील्ड?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) फिलहाल एक मुश्किल दौर से गुजर रहा है। मध्य पूर्व में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी RBI की मॉनेटरी पॉलिसी के लिए बड़ी चुनौतियां पेश कर रही हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि RBI फिलहाल ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा, यानी 'पॉज' जारी रहेगा। लेकिन, बढ़ती महंगाई, करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) में वृद्धि और बॉन्ड यील्ड्स पर लगातार बना दबाव RBI के लिए एक नाजुक संतुलन बनाने जैसा है।
महंगाई का बढ़ता खतरा
कच्चे तेल की ऊंची कीमतें महंगाई को बढ़ाने वाला सबसे बड़ा फैक्टर हैं। अगर क्रूड ऑयल $70 प्रति बैरल के अपने मुख्य अनुमान से लंबे समय तक ऊपर बना रहता है, तो महंगाई में और तेजी आ सकती है। RBI ने खुद 2026-27 की पहली दो तिमाहियों के लिए महंगाई का अनुमान बढ़ाकर क्रमशः 4% और 4.2% कर दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में हर $10 की बढ़ोतरी महंगाई को 0.3% तक बढ़ा सकती है।
बॉन्ड यील्ड पर दबाव
ब्याज दरों में 'पॉज' के बावजूद, 10-साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड 6.67% से 6.69% के आसपास बने हुए हैं। इसका मुख्य कारण सरकार का बढ़ा हुआ उधारी कार्यक्रम है। फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए कुल मार्केट बोर्रोइंग्स पिछले साल के अनुमान से 16% बढ़कर ₹17.2 लाख करोड़ रहने का अनुमान है। वहीं, फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटा) जीडीपी का 4.3% रहने की उम्मीद है। सरकारी सिक्योरिटीज की बढ़ी हुई सप्लाई से यील्ड पर दबाव बना हुआ है, जिससे अर्थव्यवस्था में उधार लेने की लागत बढ़ रही है। ब्रोकरेज फर्म Nomura का अनुमान है कि यील्ड 6.9%-7% तक जा सकती है। मध्य पूर्व का तनाव इस दबाव को और बढ़ा रहा है।
लिक्विडिटी की स्थिति
इसके बावजूद, भारतीय बैंकिंग सिस्टम में अच्छी-खासी लिक्विडिटी सरप्लस बना हुआ है। मार्च 2026 की शुरुआत में यह ₹2.63 लाख करोड़ था। इसे मैनेज करने के लिए RBI ने ₹1 लाख करोड़ की ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMO) खरीद की घोषणा की है, ताकि टैक्स के बड़े भुगतान से पहले लिक्विडिटी डाली जा सके। हालांकि, बैंकों द्वारा अपने सरकारी बॉन्ड बेचने की इच्छा को लेकर चिंताएं भी हैं, क्योंकि उनके पास पहले से ही कम लिक्विडिटी कवरेज रेशियो (LCR) है।
आगे का रास्ता
RBI के सामने भू-राजनीतिक अनिश्चितता, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और घरेलू वित्तीय दबावों जैसी कई चुनौतियां हैं। हालांकि महंगाई अभी RBI के लक्ष्य के दायरे में है, लेकिन ऊर्जा की कीमतों से बड़ा जोखिम बना हुआ है। बॉन्ड यील्ड्स में लगातार बढ़त यह संकेत दे रही है कि आसान पैसे का दौर शायद खत्म हो रहा है, भले ही पॉलिसी रेट स्थिर हों। RBI के लिए लिक्विडिटी मैनेजमेंट और वित्तीय स्थिरता बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा। ऊर्जा की कीमतों, महंगाई और आने वाली मॉनेटरी पॉलिसी के बीच का तालमेल आने वाले महीनों में मार्केट सेंटिमेंट को तय करेगा।