RBI की MPC मीटिंग: रेपो रेट पर लग सकती है 'ब्रेक', ग्लोबल टेंशन का साया

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AuthorAditya Rao|Published at:
RBI की MPC मीटिंग: रेपो रेट पर लग सकती है 'ब्रेक', ग्लोबल टेंशन का साया

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) इस हफ्ते अहम बैठक के लिए जुट रही है। बाजार की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या केंद्रीय बैंक मौजूदा **5.25%** के रेपो रेट पर यथास्थिति बनाए रखेगा या फिर महंगाई को काबू में रखने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी का संकेत देगा।

महंगाई और बाजार की उम्मीदें

अच्छी बात यह है कि भारत में महंगाई दर फिलहाल नियंत्रण में दिख रही है। जून 2026 के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) के अनुसार, कुछ ही चीजें 6% के ऊपरी स्तर से ऊपर चल रही हैं। यह 2022 के हाई-इन्फ्लेशन वाले दौर से बिल्कुल अलग है, जिससे पता चलता है कि महंगाई का दबाव अभी व्यापक नहीं है।

इसके बावजूद, फाइनेंशियल मार्केट्स आने वाली ब्याज दरों में बढ़ोतरी के लिए तैयार दिख रहे हैं। 1 साल का ओवरनाइट इंटरेस्ट स्वैप (OIS) रेट, जो मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए ब्याज दर में बदलाव के जोखिम को हेज (hedge) करने का एक अहम इंडिकेटर है, 2026 के जुलाई अंत तक लगभग 5.95% पर पहुंच गया था। इससे पता चलता है कि बाजार इस फाइनेंशियल ईयर में कम से कम 25-25 बेसिस पॉइंट की दो रेट हाइक्स की उम्मीद कर रहा है।

बाहरी दबाव और ग्लोबल फैक्टर्स

RBI के पॉलिसी पाथ को कई बाहरी फैक्टर मुश्किल बना रहे हैं। पश्चिम एशिया में चल रहे जियो-पॉलिटिकल टेंशन के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $100 प्रति बैरल के ऊपर चली गई हैं। ऊर्जा की बढ़ी हुई कीमतें ट्रांसपोर्टेशन और प्रोडक्शन कॉस्ट को बढ़ाती हैं, जो सीधे कंज्यूमर प्राइसेज पर असर डाल सकती हैं। इसके अलावा, एल नीनो जैसे एनवायरनमेंटल फैक्टर्स, जिनकी वजह से बारिश अनियमित हो सकती है और एग्रीकल्चर प्रभावित हो सकता है, फूड सिक्योरिटी और कीमतों के लिए एक बड़ा रिस्क पैदा करते हैं। ये सभी स्थितियां सेंट्रल बैंक के लिए एक कठिन माहौल बना रही हैं, जिसे यह तय करना है कि क्या रेट हाइक्स में अस्थायी 'पॉज' (pause) लेना सही रहेगा या फिर भविष्य की महंगाई को रोकने के लिए सक्रिय रूप से बढ़ोतरी जरूरी है।

ग्रोथ और प्राइस स्टेबिलिटी के बीच संतुलन

सेंट्रल बैंकरों के लिए सबसे बड़ी चिंता 'बिहाइंड द कर्व' (behind the curve) होने का रिस्क है। इसका मतलब है कि बढ़ती कीमतों से लड़ने के लिए पर्याप्त तेजी से रेट हाइक न कर पाना। हालांकि, RBI के पिछले साइकल्स के ऐतिहासिक सबूत बताते हैं कि एक अस्थायी 'पॉज' का मतलब यह नहीं है कि बैंक का कंट्रोल खत्म हो गया है। IMF जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के रिसर्च से पता चलता है कि अगर रेट हाइक्स में शुरुआती देरी के बाद निर्णायक कदम उठाए जाते हैं, तो भी महंगाई को कंट्रोल करने का असर प्रभावी हो सकता है। आने वाले फैसले में इस बात पर फोकस रहने की उम्मीद है कि RBI अपनी भविष्य की रणनीति का कम्युनिकेशन कैसे करता है। इन्वेस्टर्स ऑफिशियल पॉलिसी स्टेटमेंट पर नजर रखेंगे कि क्या सेंट्रल बैंक आने वाले महीनों में महंगाई के बिगड़ने के संकेत दिखने पर और रेट हाइक्स के लिए अपने विकल्प खुले रखता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.