भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने आज अपनी मॉनेटरी पॉलिसी में रेपो रेट को **5.25%** पर बरकरार रखा है। साथ ही, केंद्रीय बैंक ने 2027 के लिए जीडीपी ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर **6.7%** कर दिया है। बॉन्ड मार्केट में खुशी की लहर है, लेकिन फंड मैनेजरों में लॉन्ग-टर्म या शॉर्ट-टर्म डेट में निवेश को लेकर राय बंटी हुई है।
RBI ने क्या कहा?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने हालिया समीक्षा में रेपो रेट को 5.25% पर अपरिवर्तित रखने का फैसला किया है। इससे लोन लेने की लागत स्थिर रहेगी और वित्तीय व्यवस्था को स्थिरता मिलेगी। इस फैसले के साथ, केंद्रीय बैंक ने 2027 के लिए जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को बढ़ाकर 6.7% कर दिया है, वहीं सीपीआई (CPI) महंगाई दर के अनुमान को घटाकर 5.0% कर दिया है। निवेशकों और बाजार के प्रतिभागियों के लिए, यह स्थिरता एक संकेत है कि केंद्रीय बैंक आर्थिक विकास और मूल्य नियंत्रण के बीच संतुलन बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
बॉन्ड मार्केट की प्रतिक्रिया
इस घोषणा के बाद, बॉन्ड मार्केट में आशावाद देखा गया है। निवेशक आम तौर पर एक स्थिर पॉलिसी रेट और न्यूट्रल स्टांस को एक सकारात्मक संकेत मानते हैं, क्योंकि इससे अचानक दरें बढ़ने की अनिश्चितता खत्म हो जाती है। हालांकि, राहत की इस साझा भावना के बावजूद, डेट फंड मैनेजरों के बीच अपने बॉन्ड पोर्टफोलियो को कैसे प्रबंधित किया जाए, इस पर एक स्पष्ट विभाजन देखा जा रहा है। यह असहमति निवेश की 'अवधि' (duration) पर केंद्रित है, जिसका अर्थ है कि कोई बॉन्ड ब्याज दरों में बदलाव के प्रति कितना संवेदनशील है।
फंड मैनेजरों में क्यों है मतभेद?
कुछ फंड मैनेजर लॉन्ग-टर्म बॉन्ड में एक्सपोजर बढ़ाने की वकालत कर रहे हैं। इसके पीछे यह उम्मीद है कि बॉन्ड यील्ड धीरे-धीरे कम हो सकती है, जिससे लॉन्ग-टर्म सिक्योरिटीज रखने वालों को फायदा होगा। इस रणनीति के समर्थक मानते हैं कि वर्तमान सरकारी बॉन्ड यील्ड कर्व के अभी भी स्टीप (steep) बने रहने से, लंबी अवधि के लिए उच्च दरों को लॉक करने का एक अच्छा अवसर है। यह दृष्टिकोण उन निवेशकों के लिए उपयुक्त है जो ब्याज दरों में गिरावट की स्थिति में संभावित लाभ के बदले अधिक अस्थिरता स्वीकार करने को तैयार हैं।
इसके विपरीत, अन्य प्रमुख फंड मैनेजर अधिक सतर्क मार्ग की सिफारिश कर रहे हैं। वे शॉर्ट-टू-इंटरमीडिएट टर्म बॉन्ड को प्राथमिकता दे रहे हैं, जो अधिक स्थिर आय प्रदान करते हैं और बाजार में तेज उतार-चढ़ाव के प्रति कम संवेदनशील होते हैं। यह समूह हाई-क्वालिटी कॉर्पोरेट बॉन्ड और राज्य सरकारी सिक्योरिटीज पर ध्यान केंद्रित करने का सुझाव देता है। उनकी सावधानी बाहरी जोखिमों से प्रेरित है जो केंद्रीय बैंक के सीधे नियंत्रण से बाहर हैं। प्रमुख चिंताओं में पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में संभावित अस्थिरता, साथ ही अनियमित मानसून पैटर्न या अल नीनो (El Niño) प्रभाव के कारण खाद्य कीमतों में वृद्धि का जोखिम शामिल है।
चूंकि RBI ने इस बात पर जोर दिया है कि उसकी पॉलिसी डेटा-डिपेंडेंट (data-dependent) बनी रहेगी, इसलिए बाजार संभवतः आने वाली जानकारी के प्रति संवेदनशील रहेगा। निवेशक संभवतः वैश्विक भू-राजनीतिक विकास और घरेलू महंगाई के आंकड़ों पर नजर रखना जारी रखेंगे, क्योंकि ये कारक केंद्रीय बैंक के भविष्य के निर्णयों को प्रभावित करेंगे।
