भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी अगस्त की पॉलिसी मीटिंग में प्रमुख रेपो रेट को **5.25%** पर स्थिर रखा है और न्यूट्रल स्टैंड अपनाया है। केंद्रीय बैंक ने मौजूदा फाइनेंशियल ईयर के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर **6.7%** कर दिया है, जबकि महंगाई का अनुमान थोड़ा घटाकर **5.0%** किया है। इस फैसले से फाइनेंशियल मार्केट्स में स्थिरता आई है, हालांकि नीति निर्माता खाद्य कीमतों और ग्लोबल ऑयल की अस्थिरता के जोखिमों पर नजर बनाए हुए हैं।
RBI का बड़ा फैसला: रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी लेटेस्ट पॉलिसी रिव्यू में रेपो रेट को 5.25% पर अपरिवर्तित रखने का फैसला किया है। रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों को पैसा उधार देता है, और यह पूरे देश में लोन और डिपॉजिट रेट्स के लिए एक प्रमुख बेंचमार्क का काम करता है। दर को स्थिर रखकर, मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने एक न्यूट्रल स्टैंड का विकल्प चुना, जो मौजूदा आर्थिक माहौल के प्रति एक सतर्क लेकिन संतुलित दृष्टिकोण का संकेत देता है।
ग्रोथ का आउटलुक मजबूत
आर्थिक ग्रोथ पर केंद्रीय बैंक का नजरिया आशावादी बना हुआ है। RBI ने फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए रियल GDP ग्रोथ के अनुमान को पिछले 6.6% के अनुमान से बढ़ाकर 6.7% कर दिया है। यह बढ़ोतरी भारतीय अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित मजबूती में विश्वास को दर्शाती है, भले ही वैश्विक हालात अनिश्चित बने हुए हैं। इस स्थिरता पर फाइनेंशियल मार्केट्स ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी, जिसमें निफ्टी 50 और एसएंडपी बीएसई सेंसेक्स जैसे प्रमुख सूचकांकों में घोषणा के बाद मजबूती दर्ज की गई।
महंगाई और ग्लोबल जोखिम
जहां एक ओर ग्रोथ की तस्वीर सकारात्मक दिख रही है, वहीं केंद्रीय बैंक महंगाई को लेकर सतर्क है। RBI ने साल के लिए कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन (CPI) के अनुमान को 5.1% से घटाकर 5.0% कर दिया है। यह कदम जून की 4.38% की हेडलाइन इन्फ्लेशन रीडिंग के बाद आया है, जो 17 महीनों में पहली बार था जब महंगाई 4% के लक्ष्य को पार कर गई थी।
नीति निर्माताओं ने इस बात पर जोर दिया कि महंगाई मुख्य रूप से सिस्टमैटिक डिमांड में व्यापक वृद्धि के बजाय अस्थिर खाद्य और ईंधन लागतों के कारण बढ़ी है। चिंता का एक प्रमुख क्षेत्र एल नीनो जैसे जलवायु पैटर्न का खाद्य उत्पादन और कीमतों पर संभावित प्रभाव बना हुआ है। इसके अतिरिक्त, RBI वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों की भी निगरानी कर रहा है, जो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव पैदा कर सकते हैं।
निवेशकों और व्यवसायों के लिए, न्यूट्रल स्टैंड यह दर्शाता है कि केंद्रीय बैंक मूल्य स्थिरता पर अधिक सुसंगत डेटा देखने से पहले दरों में कटौती करने की जल्दबाजी में नहीं है। आने वाले महीनों में फोकस इस बात पर रहेगा कि ग्लोबल ऑयल की कीमतें कैसे व्यवहार करती हैं और क्या खाद्य आपूर्ति स्थिर रहती है, जो भविष्य की पॉलिसी एडजस्टमेंट्स को निर्देशित करने वाले प्राथमिक कारक होंगे।
