RBI ने 7 अक्टूबर को रेपो रेट में **25 बेसिस पॉइंट्स** की बढ़ोतरी कर इसे **5.50%** कर दिया है। सेंट्रल बैंक ने अब 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' (calibrated tightening) का रुख अपनाया है, जो ग्लोबल मार्केट में बढ़ती महंगाई के खिलाफ एक बड़ा कदम है।
आरबीआई का बड़ा कदम
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने अपनी मॉनेटरी पॉलिसी में बड़ा बदलाव करते हुए रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाकर 5.50% कर दिया है। यह फैसला 7 अक्टूबर 2026 को लिया गया। आरबीआई का यह कदम पिछले न्यूट्रल स्टैंड से हटकर 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' (calibrated tightening) की ओर एक सख्त इशारा है।
ग्लोबल ट्रेंड और महंगाई का असर
आरबीआई का यह फैसला अकेले नहीं है। सितंबर और अक्टूबर 2026 के दौरान दुनिया भर के 16 सेंट्रल बैंक ब्याज दरों में इजाफा कर चुके हैं। वेस्ट एशिया में चल रही अस्थिरता के कारण एनर्जी की कीमतों में उछाल और ग्लोबल AI इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी डिमांड ने स्ट्रक्चरल इन्फ्लेशन को जन्म दिया है, जो काफी जिद्दी बनी हुई है।
निवेशकों और कंपनियों पर क्या होगा असर?
रेपो रेट बढ़ने का सीधा मतलब है कि बैंकों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाएगा, जिसका बोझ अंततः आम ग्राहकों पर पड़ेगा।
- EMI का बोझ: होम लोन, ऑटो लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें बढ़ने की पूरी संभावना है, जिससे कंज्यूमर स्पेंडिंग में कमी आ सकती है।
- कंपनियों के मुनाफे पर दबाव: जिन कंपनियों पर कर्ज ज्यादा है, उनके इंटरेस्ट खर्चे बढ़ेंगे, जिससे उनके नेट प्रॉफिट मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
- बॉन्ड मार्केट: सरकारी सिक्योरिटीज की यील्ड (Yield) दशकों के ऊपरी स्तर पर पहुंच गई है, जो फिक्स्ड इनकम निवेशकों के लिए तो अच्छा है लेकिन इक्विटी मार्केट के लिए चुनौती बन सकता है।
अगले कुछ महीनों तक निवेशकों को ब्याज दरों के नए ट्रेंड और कंपनियों के अर्निंग्स पर नजर रखनी होगी, ताकि यह समझा जा सके कि बिजनेस बढ़ती इनपुट कॉस्ट और महंगे कर्ज के दौर में अपने मार्जिन को कैसे प्रोटेक्ट करते हैं।
