Reserve Bank of India (RBI) का कहना है कि घरेलू अर्थव्यवस्था की रफ्तार अच्छी है, लेकिन खाने-पीने की महंगी चीजों और ग्लोबल तनाव ने चिंता बढ़ा दी है। विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) के **$765.9 बिलियन** के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बावजूद, निवेशक अब ब्याज दरों पर पड़ने वाले असर पर पैनी नजर रखे हुए हैं।
महंगाई का बढ़ता दबाव
सेंट्रल बैंक के अनुसार, देश की अर्थव्यवस्था फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की पहली तिमाही में मजबूत रही है। हालांकि, खाने-पीने की चीजों के दाम चुनौती बने हुए हैं। 21 सितंबर, 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक गेहूं, चावल और दालों के दाम लगातार ऊपर जा रहे हैं। साथ ही, प्याज, टमाटर और खाद्य तेलों (Edible Oils) की कीमतों में उतार-चढ़ाव Monetary Policy Committee (MPC) के लिए सिरदर्द बना हुआ है। जब फूड इन्फ्लेशन अधिक होती है, तो आरबीआई आमतौर पर ब्याज दरों को स्थिर रखने का फैसला लेता है ताकि महंगाई और न बढ़े।
विदेशी निवेश और मुद्रा भंडार
कैपिटल फ्लो की बात करें तो जुलाई में Foreign Direct Investment (FDI) 5 साल के उच्चतम स्तर पर रहा, जो भारतीय बाजार में लॉन्ग-टर्म भरोसे को दिखाता है। हालांकि, सितंबर में Foreign Portfolio Investment (FPI) में निकासी देखी गई। इसके पीछे की बड़ी वजह वेस्ट एशिया में चल रहा संघर्ष है, जिससे तेल की कीमतें बढ़ने का खतरा है। अच्छी खबर यह है कि भारत का फॉरेक्स रिजर्व 18 सितंबर तक $765.9 बिलियन के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है, जो किसी भी बाहरी झटके से निपटने के लिए एक मजबूत सुरक्षा घेरा है।
निवेशकों के लिए आगे की राह
निवेशकों की नजर अब इस बात पर है कि बढ़ती महंगाई के बीच आरबीआई अपनी पॉलिसी में क्या बदलाव करता है। अगर खाने-पीने की महंगाई कंट्रोल में नहीं आती, तो ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदें कम हो सकती हैं। साथ ही, बाजार यह देख रहा है कि FPI की निकासी सिर्फ एक अस्थायी ग्लोबल रिएक्शन है या बाजार के सेंटिमेंट में कोई बड़ा बदलाव।
