भारत की क्विक कॉमर्स कंपनियां अब अपनी रणनीति बदल रही हैं। मार्केट शेयर हासिल करने के बजाय अब फोकस 'यूनिट इकोनॉमिक्स' पर है। जहां Blinkit ऑपरेटिंग ब्रेक-ईवन तक पहुंच गई है, वहीं Swiggy, Zepto और BigBasket अभी भी भारी घाटे से जूझ रही हैं।
क्विक कॉमर्स सेक्टर में बीते कुछ सालों से जो होड़ लगी थी, वह अब एक नए पड़ाव पर है। पहले कंपनियां ग्राहकों को लुभाने के लिए भारी-भरकम डिस्काउंट देती थीं, लेकिन अब प्राथमिकता हर ऑर्डर पर मुनाफा (Unit Economics) कमाने की है।
मुनाफे का गणित और बड़ा अंतर
इस बदलाव के बीच कंपनियों के वित्तीय आंकड़ों में साफ अंतर दिख रहा है। Blinkit ने वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में ₹102 करोड़ का एडजस्टेड EBITDA दर्ज करके ऑपरेटिंग ब्रेक-ईवन हासिल कर लिया है, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में कंपनी को ₹162 करोड़ का नुकसान हुआ था। वहीं दूसरी ओर, Swiggy के क्विक कॉमर्स डिवीजन को ₹778 करोड़ का ऑपरेटिंग घाटा उठाना पड़ा है। Zepto और BigBasket जैसे खिलाड़ी भी देश भर में 7,000 से ज्यादा डार्क स्टोर्स का नेटवर्क चलाने के कारण अभी भी भारी नुकसान में हैं।
कैसे बढ़ेगा मार्जिन?
कंपनियां अब केवल ग्रोसरी तक सीमित नहीं हैं। प्रॉफिट मार्जिन बढ़ाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और लाइफस्टाइल जैसे महंगे उत्पादों पर फोकस किया जा रहा है। मकसद साफ है—डिलीवरी वाहनों की क्षमता का पूरा उपयोग करना और डार्क स्टोर्स के नेटवर्क को और अधिक कुशल बनाना।
चुनौतियां और रेगुलेटरी रिस्क
इस ग्रोथ के सामने कई बड़ी चुनौतियां भी हैं। ऑफलाइन रिटेल ट्रेड एसोसिएशन का आरोप है कि क्विक कॉमर्स कंपनियां 'प्रिडेटरी प्राइसिंग' का इस्तेमाल कर रही हैं, जिससे पारंपरिक किराना दुकानों को नुकसान हो रहा है। इसे लेकर सरकार की ओर से रेगुलेटरी दबाव बढ़ता जा रहा है। इसके अलावा, गिग वर्कर्स के लिए नए लेबर लॉ और वेलफेयर मेजर्स से भी कंपनियों की ऑपरेशनल लागत बढ़ने की उम्मीद है।
निवेशकों के लिए अब यह देखना अहम होगा कि कंपनियां अपनी बढ़ती लागत को कैसे मैनेज करती हैं और क्या छोटे प्लेयर्स मुनाफे की राह पर लौट पाएंगे।
