ताजा 'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे के अनुसार, एक साथ चुनाव कराने (Simultaneous Elections) के समर्थन में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई है। जनवरी 2026 में जो समर्थन **74%** था, वह अब घटकर **70.4%** पर आ गया है।
सरकारी स्तर पर भले ही 2029 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की तैयारी चल रही हो, लेकिन जनता की राय में बदलाव दिख रहा है। अगस्त 2026 के सर्वे के मुताबिक, इस प्रस्ताव के विरोध का आंकड़ा भी बढ़कर 24.1% तक पहुंच गया है।
क्यों जरूरी है यह बदलाव?
'वन नेशन, वन इलेक्शन' का मुख्य उद्देश्य बार-बार होने वाले चुनावों के कारण सरकारी खजाने पर पड़ने वाले बोझ को कम करना है। सरकार का तर्क है कि चुनाव में लगने वाला भारी-भरकम खर्च और प्रशासन का ध्यान भटकने से इन्फ्रास्ट्रक्चर, एजुकेशन और हेल्थकेयर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर असर पड़ता है। अगर चुनाव एक साथ होते हैं, तो नीतिगत अनिश्चितता (Policy Uncertainty) का दौर भी कम होगा।
रास्ते में कानूनी और राजनीतिक चुनौतियां
फिलहाल, 31 सदस्यों वाली जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी 'Constitution (129th Amendment) Bill, 2024' की समीक्षा कर रही है। हालांकि, इसे लागू करना इतना आसान नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती राज्यों का सहयोग हासिल करना है, क्योंकि केंद्र के पास राज्यों की विधानसभाओं को भंग करने का कानूनी अधिकार नहीं है।
विपक्ष का तर्क है कि यह भारत के फेडरल स्ट्रक्चर के लिए खतरा हो सकता है और क्षेत्रीय मुद्दों को हाशिए पर धकेल सकता है। निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार 2028 तक जरूरी संवैधानिक संशोधनों को कैसे पास कराती है और क्या आम सहमति बन पाती है।
